Wednesday, March 16, 2016

Shri Gusaiji Ke Sevak Chatur Bihari Ki Varta

२५२ वैष्णवो की वार्ता
(वैष्णव ११८)श्रीगुसांईजी के सेवक चतुर बिहारी की वार्ता

चतुरबिहारी ने श्रीगोकुल में आकर श्रीगुसांईजी से प्राथना की -" मुझे अपनी शरण में लो|" श्रीगुसांईजी ने कृपा करके उसे नाम निवेदन कराया| उस समय श्रीनवनीतप्रियजी के राजभोग का समय था| चतुर बिहारी को लीला सहित दर्शन हुए| चतुर बिहारी ने नया पद रच कर गाया-
" किये जो चटक मटक ठाडो रहत न घट पर "
यह पद सुनकर श्रीगुसांईजी बहुत प्रसन्न हुए| श्रीगुसांईजी ने जान लिया की श्रीनवनीतप्रियजी ने इनको लीला का अनुभव कराया है| इसके बाद चतुर बिहारी श्रीजी द्वार में आए| श्रीगुसांईजी के संग श्रीनाथजी के दर्शन किए| उस समय मंगला की बेला थी, चतुर बिहारी ने नये पद गाए| फिर राजभोग के समय श्रीनाथजी के सन्निधान में नये पद गाए| यथा- पद
" अनंत न जइये हो पिये रहिये मेरे मेहेल|"
यह सुनकर श्रीगुसांईजी बहुत प्रसन्न हुए| श्रीगुसांईजी पोढते थे तो चतुर बिहारी उनको पंखा करते थे| साथ ही पद भी गाते थे| ये चतुर बिहारी श्रीगुसांईजी के चरणारविन्दो की जन्मपर्यन्त सेवा करते रहे|

| जय श्री कृष्णा
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