Sunday, November 19, 2017

Shri Gusaniji Ke Sevak Birbal Ki Beti Ki Varta


२५२ वैष्णवों की वार्ता   
(वैष्णव - ४८ श्री गुसाँईजी के सेवक बीरबल की बेटी की वार्ता



एक दिन श्रीगुसांईजी आगरा पधारे थे। बीरबल की बेटी ने उनके दर्शन किए। उसे साक्षात् पूर्ण पुरुषोत्तम के दर्शन हुए। तब बीरबल की बेटी श्री गुसाँईजी के सेवक हुए ओर नित्य कथा सुनाने के लिए श्रीगुसांईजी के पास जाती थी। कथा में जो भी सुनती थी , वह मन मे रखती थी , एक अक्षर भी नहीं भूलती थी। वह रत दिन उसी कथा का अनुभव करती रहती थी। एक दिन बीरबल से बादशाह ने पूछा - "साहब से मिलाना कैसे होता है ? यह निश्चय करके बताओ। " बीरबल ने सारे पण्डित ओर महन्तो से पूछा , लेकिन उनकी समाज में उत्तर नहीं आया। प्रश्न का उत्तर न पाकर बीरबल को डर सा लगा, न जाने बादशाह क्या कहने लग पड़े। बीरबल की बेटी ने कहा - "एएस प्रश्न का उत्तर श्रीगुसांईजी देंगे। बीरबल श्री गोकुल आए और श्रीगुसांईजीसे विनती की। श्री गुसाँईजी आपको एकांत में देंगे। " तब तो बादशाह श्री गोकुल आए उनके साथ बीरबल भी आया। बीरबल श्रीगुसांईजी को बादशाहके डेरा पर साथ ले गया। बादशाह ने एकांत में श्री गुसाँईजी से पूछा -" साहब कैसे मिलते है, कोई उपाय साधन बताओ। "श्री गुसाँईजी ने लौकिक ृत से उत्तर दिया - "जैसे तुम हमको मिले हो, ऐसे ही साहब मिलते हे। " बादशाह ने कहा - "ऐसे स्पष्ट समजकर बताओ। " श्री गुसाँईजी ने कहा - " हम हजारो उपाय करें तो भी तुमसे मिलाना बहुत कठिन होता हे ओर यदि तुम मिलाना चाहो तो एक घडी भी नहीं लगे गी। तुम्हारे चाहने पर तुम हमें सहज ही मिल गए हो। इसी तरह जिव चाहकर भी साहब से नहीं मिल सकता हे , यदि साहब चाहे तो शिग्र जीव को अपना कर लेते हे। जिव के हाथ में कुछ भी नहीं हे , साहब की मर्जी होतो अलग एक क्षण भी नहीं लगाती हे। वह मिल जाता है। यह सुनकर बादशाह बहुत प्रसन्न हुए। बादशाह ने श्री गुसाँईजी को दण्डवत की ओर विनती की , की मेरी ओर से कुछ अङगीकार करो। श्री गुसाँईजी ने कहा - "हमें ऐसी सवारी दो, जो एक घंटे में हमें गोपालपुर पहुंचा दे। "बादशाह ने श्री गुसाँईजी को ऐसा घोडा भेंट किया जो एक घंटा में देश कोष दुरी पर कर लेता था। घोड़े को खर्च के लिए श्रीगोकुल ओर गोपालपुर में दो गावँ दिए। उस घोड़े पर बेठकर श्रीगुसांईजी गोपालपुर ऐ ओर फिर श्री गोकुल पधारे। घोडा की बात श्री गोपालदासजी ने सप्तम वल्लभाख्यान में कही हे - "तुरंग चले वेगे , उतावला जगे नौका चली सिंधु तरवा। " -- ऐसी रीती से गोपालदास ने वर्णन किया हे। वह बीरबल की बेटी ऐसी कृपा पात्र थी श्रीगुसांईजी के ऊपर ऐसा विश्वाश था, इनकी वार्ता कहाँ तक कहें।
                                                        | जय श्री कृष्ण |
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1 comments:

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