Saturday, March 5, 2016

Shri Gusaiji Ke Sevak Kayasth Pita Putra Ki Varta

२५२ वैष्णवो की वार्ता
(वैष्णव ११४)श्रीगुसांईजी के सेवक कायस्थ पिता-पुत्र की वार्ता

इन पिता-पुत्रों ने एक परगना इजारे लिया था अत: इन पर राजदार की बीस हजार रुपया की देनदारी हो गई अत: पातशाह ने इनको बन्दी खाने में बन्द क्र दिया | इन्होंने अपने पुरोहित को देश में भेजा,ताकि कुछ रुपया ला सके | पुरोहित ने इनके घर के सामान को बेचने से दो हजार रूपये प्राप्त किए और एक ब्राह्मण से कर्ज में तीन हजार रूपये लिए| इस प्रकार पांच हजार रुपया लेकर पुरोहित लौटा तो वे दोनों बड़े निराश हुए | इन्होंने विचार किया कि इन पाँच हजार रुपयों से हमारा छुटकारा तो होगा नहीं अत: घर के माल असबाव को बेचने से प्राप्त दो हजार रुपया तो श्रीगुसांईजी को भेंट में भेज दे और ब्राह्मण के कर्ज के तीन हजार रूपये उसे लौटा दिये जाएँ| यह सोचकर उन्होंने ऐसा ही किया | जब श्रीगुसांईजी के पास दो पास दो हजार रुपयों की भेंट पहुँची तो उन्होंने पुरोहित से पूछा- " दोनों पिता-पुत्र कहाँ हैं ?" पुरोहित ने सारा विवरण सुना दिया | श्रीगुसांईजी ने चाचा हरिवंशजी को बीरबल के पास पत्र लेकर दिल्ली भेजा | चाचा हरिवंशजी दिल्ली में बीरबल के यहाँ उतरे | एक मनुष्य को पिता-पुत्रों के पास भेजा उस मनुष्य के हस्ते वह पत्र भी भेजा जो श्रीगुसांईजी ने बीरबल को लिखा था | उस पत्र में श्रीगुसांईजी ने बीरबल को लिखा था कि सम्बंधित पिता-पुत्रों को बन्दीखाने से मुक्त करा दें | ये राज के बीस हजार चुकाएगे | मैं इनकी जमानत देता हूँ | पिता पुत्रों ने पत्र को पढ़ा और श्रीगुसांईजी की जनामत वाले पत्र को छुपा लिखा | उन्होंने उस व्यक्ति से कहा कि यह पुनः मत ले जाओ | चाचा हरिवंशीजी पूछें तो उनसे कह देना "पत्र तो खो गया" उस मनुष्य ने ऐसा ही किया | चाचा हरिवंश ने मन में कहा - " कोई बात नहीं है, श्रीगुसांईजी के आशीर्वाद से बिना पत्र के ही कार्य सिध्र होगा |" चाचाजी ने बीरबल से कहा - " कायस्थ पिता-पुत्रों के बीस हजार के जमानत श्रीगुसांईजी हैं,अत: इन दोनों को बन्दी खाने से मुक्त करा दो |" बीरबल ने कहा - " मेरे पास जो कुछ भी है,वह सब श्रीगुसांईजी की कृपा से है अत: इनके बीस हजार रुपया की जामिनी मैं स्वयं बनूँगा |" यह कहकर बीरबल ने बादशाह से कहकर उनदोनों को मुक्त करा दिया | वे दोनों मुक्त होकर परगने में चले गए | उन्होंने रुपया कमा कर उन्हें अदा कर दिये | ये दोनों बाप- बेटा श्रीगुसांईजी के ऐसे कृपा पात्र थे, जिनने बन्दीखाने में रहना स्वीकार किया,लेकिन धर्म नहीं छोड़ा |

|जय श्री कृष्णा|
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