Wednesday, December 30, 2015

Shri Gusaiji Ka Sevak Ek Virakt Aur Aagare Ke Seth Ki Varta

२५२ वैष्णवों की वार्ता
(वैष्णव ९२)श्रीगुसांईजी का सेवक एक विरक्त और आगरे के सेठ की वार्ता

वह विरक्त चुटकी माँगकर निर्वाह करता था| श्रीठाकुरजी की सेवा भी भली भाँति करता था| श्रीठाकुरजी उस पर प्रसन्न भी बहुत रहते थे| एक दिन उस विरक्त का एक सेठ से मिलाप हुआ| सेठ ने उस विरक्त से कहा-" तुम श्रीठाकुरजी पधरा कर मेरे घर पर रहो| हम तुम हिलमिलकर सेवा किया करेंगे|" विरक्त उस सेठ के घर में जाकर रहने लगा| बहार से जो सामग्री वांछित होती थी उसे विरक्त खरीद लाया करता था| एक दिन बाजार में सर्वप्रथम नया खरबूजा आया| उस विरक्त ने खरबूजा चाहा| खरबूजे वाले ने एक रुपया कीमत माँगी| विरक्त रुपया देने लगा| उसी समय अन्य ग्राहक ने सवा रुपया लगाकर खरबूजा लेना चाहा| वैष्णव ने डेढ़ रुपया देना स्वीकार किया| लेकिन दोनों खरीददारों में स्पर्धा बढ़ने लगी| खरबूजा का भाव पॉँच-दस-बीस-तीस-सौ-पाँच सो, हजार रुपया तक पहुँच गया| उस वैष्णव ने एक हजार रुपया में खरबूजा खरीद लिया| उसने सेठ के यहाँ खर्च लिखाया तो भी सेठ ने खरबूजा की कीमत एक हजार रुपया के बारे में कुछ नहीं पूछा| सेठ को विरक्त का पूर्ण विश्वास था अतः उसके मन में कोई भी विकार नहीं आया? श्रीठाकुरजी ने खरबूजा उठा लिया और सिंहासन के ऊपर खेलने लगे| जब उत्थापन हुता तो खरबूजा को सेठ ने श्रीठाकुरजी के पास में देखा| सेठ बहुत प्रसन्न हुआ| उसने श्रीठाकुरजी से कहा-" खरबूजा मुझे देओ तो मै सँवार के भोग धरुँ?" श्रीठाकुरजी ने कहा-" यह खरबूजा मै कल अरोगूंगा| यह खरबूजा मुझ को बहुत प्रिय है| यह सुनकर सेठ बहुत हुआ और उसने विरक्त के साहस की प्रशंसा की-" खरबूजा खरीदते समय कोई संकोच नहीं किया|" सेठ ऐसा कृपा पात्र था जिसने एक खरबूजा के हजार रूपा खर्च किये तो भी उसने मन में दोष नहीं हुआ|

।जय श्री कृष्ण।


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1 comments:

  1. जय श्री कृष्णा। बलिहारी प्रभु। श्यामसुन्दर श्री यमुना महारानी की जय।महाप्रभुजी की जय।गोसाईं जी परम दयाल की जय।गुरूजी प्यारे की जय।

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