Sunday, October 18, 2015

Shri Gusaiji Ke Sevak Bhagvandas Bhitariya Ki Varta

२५२ वैष्णवों की वार्ता
(वैष्णव ७१)श्रीगुसांईजी के सेवक भगवानदास भीतरिया की वार्ता

भगवानदास सांचोरा ब्राह्मण थे| गुजरात में श्रीगोकुल में आकर श्रीगुसांईजी के सेवक हुए| श्रीगुसांईजी ने कृपा करके उन्हें श्रीनाथजी की सेवा में रखा था| भगवानदास, श्रीनाथजी की सेवा अत्यधिक प्रीति से भलीभाँति करते थे| शुद्ध अन्तः करण से राजा कासा भय श्रीनाथजी का मानते थे| लेकिन उनसे बालक जैसे वत्सलता भी रखते थे| उनके अनुराग के कारण श्रीनाथजी भी उनसे बहुत प्रसन्न रहते थे| एक दिन श्रीनाथजी, श्रीगुसांईजी से बाते कर रहे थे| वही पर भगवानदास भी उपस्थित थे| श्रीगुसांईजी ने भगवानदास से पूछा-" श्रीनाथजी ने क्या कहा? तुम समझे|" भगवानदास हाथ जोड़कर बोला- " महाराज , मै तो तुच्छ जीव हूँ| आपकी कृपा के बिना भगवतवार्ता कैसे समझी जा सकती है|" यह सुनकर श्रीगुसांईजी बहुत प्रसन्न हुए| इसके बाद से श्रीनाथजी भगवानदास भीतरिया से भी बोलने लगे| श्रीनाथजी सारी बातें जताने लग गए| उन्हें जो रुचिकर होता, भगवानदास से माँग लेते थे| वह भगवानदास भीतरिया श्रीगुसांईजी का ऐसा कृपा पात्र सेवक था|

।जय श्री कृष्ण।


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2 comments:

  1. जय श्री कृष्णा। श्याम सुन्दर श्री यमुना जी की जय।श्री वल्लभ प्रभु की जय। श्री गोसाईंजी प्रभु की जय।

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  2. जय श्री कृष्णा। श्याम सुन्दर श्री यमुना जी की जय।श्री वल्लभ प्रभु की जय। श्री गोसाईंजी प्रभु की जय।

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