Wednesday, April 6, 2016

Shri Gusaiji Ke Sevak Muraridas Ki Varta

२५२ वैष्णवो की वार्ता
(वैष्णव १२७)श्रीगुसांईजी के सेवक मुरारीदास की वार्ता

मुरारीदास गौड़ देशा में नारायणदास के पास नौकरी करने के लिए गए । नारायणदास ने मुरारीदास की कर्मनिष्ठा देखकर उनको दस रूपया मासिक वेतन देना स्वीकार किया । मुरारीदास ने कहा -"मैं आठ रूपया महीन लेना स्वीकार करता हूँ क्योंकि मैं सवा प्रहर दिन चढ़ जाने पर आऊँगा और छ: घड़ी दिन शेष रहने पर चला जाऊँगा ।" मुरारीदास की यह बात नारायणदास को पसन्द आई । मुरारी दास के माथे श्रीबालकृष्णजी विराजते थे । वे उन्हें सनुभाव जनाते थे । बालक की तरह इच्छानुसार माँग भी करते थे| एक दिन नारायणदास ने विचार किया कि यह मुरारीदास प्रात:काल देर में आता है और सायंकाल जल्दी चला जाता है, इसका क्या कारण है? यह जानकारी लेने के लिए नारायणदास उसके पीछे-पीछे चुप-चाप गए और उसके घर में छिपकर बैठ गए । नारायणदास ने उसे सेवा करते हुए देखा और श्रीठाकुरजी से बातें करते देखा तथा वे चुप-चुप लौट गए| दूसरे दिन नारायणदास ने उससे कहा - "हमने तुम्हें श्रीबालकृष्णजी की सेवा करते हुए कल देखा है, तुम्हारी सारी रीति और आचार से हम बहुत प्रभावित हुए हैं अत: तुम हमें अपना सेवक बना लो|" इस पर मुरारीदास ने कहा -"हम तो श्रीगुसांईजी के सेवक हैं; यदि आप चाहो तो हम श्रीगुसांईजी से आपको सेवक करने के लिए विनय करें ।" नारायणदास के स्वीकृति देने पर मुरारीदास ने श्रीगुसांईजी को विनती-पत्र लिखा |पत्र लेकर नारायणदास अपनी स्त्री सहित श्रीगुसांईजी की सेवा में उपस्थित हुए और उनके सेवक हुए । वे दोनों स्त्री-पुरूष भगवत सेवा करने लग गए| जिस प्रकार मुरारीदास से श्रीठाकुरजी बातें करते वैसे ही नारायणदास से भी बातें करने लग गए| मुरारीदास ऐसे कृपा पात्र थे । जिनके संग से नारायणदास भी वैष्णव हो गए । अत: संग ऐसे का ही करना उचित है जिसके संग से भगवत धर्म आवे |


| जय श्री कृष्णा |




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