Wednesday, October 7, 2015

Shri Gusaiji Ke Sevak Durgadas Ki Varta

२५२ वैष्णवों की वार्ता
(वैष्णव ६६)श्रीगुसांईजी के सेवक दुर्गादास की वार्ता

दुर्गादास पूर्व देश के निवासी थे जो तीर्थ यात्रा करते हुए ब्रज में श्रीगोकुल में आए| उस समय श्रीगुसांईजी यमुनाजी के घाट पर बिराज रहे थे| उसे श्रीगुसांईजी के दर्शन कोटिकन्दप लावण्य मय पूर्ण पुरषोत्तम के रूप में हुए| दुर्गादास ने श्रीगुसांईजी से विनती की-" महाराज मुझे शरण में लो, में बहुत जन्मो से भटकर रहा हूँ| श्रीगुसांईजी को दया आई अतः उन्होंने कृपा करके उसे नाम निवेदन कराया| श्रीगुसांईजी के सेवक होकर दुर्गादास बहुत दिनों तक ब्रज में रहे| श्रीगोवर्धननाथजी के दर्शन किए| फिर दुर्गादास अपने देश को गए| वहा श्रीठाकुरजी पधराकर सेवा करने लगे| इनके संग से बहुत लोग वैष्णव हुए| श्रीठाकुरजी दुर्गादास के साथ बालको सा व्यवहार करते थे| बालक की तरह चाहे जो वस्तु मांग लेते थे| बालपन की समस्त लीलाओ का अनुभव कराते थे| दुर्गादास ऐसे कृपापात्र भगवदीय थे|


।जय श्री कृष्ण। 
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