Thursday, April 2, 2015

Shri Gusaiji Ke Sevak Ek Kunbi Vaishnav Ki Varta

२५२ वैष्णवों की वार्ता
(वैष्णव - २०)श्रीगुसांईजी के सेवक एक कुनबी वैष्णव की वार्ता


वह कुनबी गुजराती वैष्णवों के साथ श्रीगोकुल में आया| वहाँ वह श्रीगुसांईजी का सेवक हुआ और श्रीगुसांईजी से विनती की-" मुझे गायों की सेवा में रखो|" श्रीगुसांईजी ने उनकी प्राथना को स्वीकार कर उसे गायों की सेवा पर नियुक्त कर दिया। वह वन में गायों चराने हेतु जाता था । गायों को चादर से पोंछता था । गायों के नीचे से गीली मिटटी हटाकर सूखी मिटटी बिछाता था | वह तन मन से गायों की सेवा करता था| उसकी ऐसी सेवा देखकर श्रीगोवर्धननाथजी बहुत प्रसन्न हुए । उस पटेल को श्रीनाथजी खिडक में दर्शन देने लगे| उसके साथ खेलने लगे । वहाँ छाक मण्डली करते थे तो उस पटेल को गोप ग्वालों के बीच बैठाकर खिलाते थे । अतः वह महाप्रसाद की पत्तल लेने नहीं जाता था| वह तो एक बार श्रीगुसांईजी के दर्शन करने के लिए जाता था । श्रीगुसांईजी ने एक दिन उससे पूछा -" पटेल, तुम महाप्रसाद कहाँ लेते हो?" पटेल ने हाथ जोड़कर कहा -" श्रीनाथजी वन में छोरों (ग्वालों) के संग नित्य भोजन करने पधारते हैं और मुझको भी खिलाते हैं| फिर में पत्तल लेने क्यों आऊ यह सुनकर श्रीगुसांईजी बहुत प्रसन्न हुए| एक दिन उस ग्वाल मण्डली में एक वैष्णव ने पद गाया-" नाचत रास में गोपाल|" तब उस पटेल ने कहा -" नाचत घास में गोपाल|" यह सुनकर ग्वाल - बाल उसे पकड़कर श्रीगुसांईजी के पास ले गये| वैष्णवों ने श्रीगुसांईजी से कहा -" महाराज यह पद को इस प्रकार कहता हैं| श्रीगुसांईजी ने कहा-" इसने श्रीनाथजी को घास में नाचते देखा हैं| तुमने उन्हें रास में नाचते देखा हैं| अतः तुम दोनों की बात सच हैं| श्रीगोवर्धननाथजी की इच्छा हो, अपने भक्त को वही दर्शन देते हैं| दोनों की बात सच है| यह सुनकर वैष्णव बहुत प्रसन्न हुए| श्रीनाथजी पटेल के साथ सखाभाव से रहते थे । श्रीगुसांईजी की कृपा से उसे ऐसा अनुभव हुआ|


।जय श्री कृष्ण। 
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