Sunday, February 21, 2016

Shri Gusaiji Ke Sevak Gopaldas Ki Varta

252 Vashnvo of talks
(Vaishnava १०९) श्रीगुसांईजी के सेवक गोपालदस की वार्ता
( Context - 1 )


  गोपालदस   रुपालगा में रहते थे | उनकी सगाई भाईला कोठारी के घर हुई थी | एक दिन उनका निमन्त्रण भाईला कोठारी के यहाँ था | उस समय गोपालदास पांचवर्ष के थे | उनको देखकर श्रीगुसांईजी ने पूछा - '' ये कौन हैं ?'' भाईला   कोठारी ने निवेदन किया - '' ये तो गोमती का वर है | '' श्रीगुसांईजी ने कहा - '' गोमती का वर तो सागर होना चाहिए |'' तब कोठारी ने कहा = '' राज की कृपा से यह भी सागर ही हो जाईगा |'' यह बात सुनकर श्रीगुसांईजी ने विचार किया '' मेरे सेवक भाईला कोठारी   का वचन सत्य होना चाहिए |'' फिर तो श्रीगुसांईजी ने गोपालदास को चर्चित ताम्बूल दिया | इससे गोपालदास का हर्दय   निर्मल हुआ | गोपालदास को रास लीला के दर्शन हुए | '' रास लीला में सदैव रात्रि रहती है ' अत : सवा प्रहर दिन चढ़ने पर भी गोपालदास ने केदार रागमें वल्लभाखयान गाया | सो वे गोपालदास ऐसे कृपा पात्र थे कि उन्होंने पुष्टिमार्ग का सम्पूर्ण सिध्रान्त   नवाखयान में वर्णन किया | चतुर्थ आख्यान में दादश   स्कंध की दादश लीलाओ का समावेश करके एकैक तुक में एकैक स्कंध की लीलाओं का गायन किया |
( Context - 2 )
 गोपालदास के हर्दय में श्रीगुसांईजी ने स्वयं ही प्रवेश किया और अपने ही स्वमुख से उच्चित वल्लभाखयान गोपालदास के मुख द्वारा प्रकट किया | जैसे श्रीमद् भागवत को श्रीठाकुरजी ने श्रीशुकदेवजी के हर्दय में प्रवेश कराके शुकदेवजी के मुख द्वारा प्रकट कराई | इसी लिए श्रीमद् भागवत में कही भी '' श्रीराधा इस प्रकार से नाम विधमान नहीं हैं | इसी प्रकार वल्लभाखयान में भी कहीं भी श्रीरुकमणि बहूजी तथा श्रीपदमावती बहूजी का नाम नहीँ है | वे   गोपालदास ऐसे कृपा पात्र भक्त थे |


| Jai Shri Krishna |
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