Thursday, April 30, 2015

Shri Gusaiji Ke Sevak Kanhadas Ki Varta

२५२ वैष्णवों की वार्ता
(वैष्णव २८)श्रीगुसांईजी के सेवक कान्हदास की वार्ता( जो गुजरात राजनगर में रहते थे)



एक समय श्रीगुसांईजी राजनगर पधारे थे| उस समय कान्हदास श्रीगुसांईजी के सेवक हुए थे| वे श्रीठाकुरजी पधरा कर सेवा करने लगे| कान्हदास की स्त्री और बेटा सब सेवा में स्नान करते थे| कान्हदास के बेटा की बहू बहुत भोली थी| वह आचार विचार में भी बहुत कम समझती थी| इसलिए उसको सेवा में नहाने नहीं देते थे । वह बहू जो वैष्णव आते थे उनकी जूठन को उठाती, पोतना करती, वैष्णवो के पाँव दबाती पंख करती, उन्हें स्नान कराती और उनके ठहरने के स्थान पर बुहारी लगाती थी| उस बहू को ऐसे सेवा के काम में लगाये रखते थे| उसको भोली समझकर श्रीठाकुरजी उससे बातें करते थे| उसे सब प्रकार की लीला जनाते थे| एक दिन कान्हदास श्रीठाकुरजी का श्रृंगार कर रहे थे| उनके मन में आई कि आज जूते (जोड़ा) लाना हैं , मोची के घर जाना है, वे यह विचार कर ही रहे थे कि एक व्यक्ति आया और उसने बेटा की बहू से पूछा-" तुम्हारा ससुर कहा है?" बहू ने कहा-" वे तो मोची के घर जोड़ा लेने गए हैं ।" यह बात सुनकर कान्हदास बाहर आए और पुत्र वधु के पैरों पर गिर पड़े| वे कहने लगे-"तैंने वैष्णव की सेवा की है अतः वैष्णवों के प्रभाव से तेरे ह्दय में भगवद स्वरूप उदय हो गया है इसलिए तू मेरे मन की बात को जान गई| श्रीठाकुरजी तेरे ऊपर प्रसन्न है और में बहुत मूर्ख हूँ, मै तेरे स्वरूप को जान नहीं पाया| अब तुम सेवा नित्य प्रति किया करो| तू अपनी इच्छा के अनुसार श्रीठाकुरजी को श्रृंगार धरना| तेरी इच्छा हो सो सामग्री धरना|" उस दिन से वह बहू सेवा में स्नान करने लगी| घर के सभी लोग बहू को पूछकर सेवा करने लगे| कान्हदास और उनके बेटा की बहू श्रीगुसांईजी के ऐसे कृपा पात्र थे|


।जय श्री कृष्ण। 
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