Thursday, April 9, 2015

Shri Gusaiji Ke Sevak Ek Viratt Ki Varta

२५२ वैष्णवों की वार्ता
(वैष्णव - २२)श्रीगुसांईजी के सेवक एक विरत्त की वार्ता



इस वैष्णव का श्रीगिरिराज की नित्य परिक्रमा करने का नियम था| नित्य परिक्रमा करते हुए बहुत समय व्यतीत हुआ तो एक दिन उसके मन में विचार आया-"श्रीगुसांईजी आज तक मुझसे बोले नहीं है| यदि कभी मुझसे बोलें तो मै धन्य होऊँ|" एक दिन उस वैष्णव के पैर में ठोकर लगी, तो वह परिक्रमा करने नहीं गया| उस दिन अन्नकूट का उत्सव था| उस वैष्णव ने विचार किया कि आज श्रीगुसांईजी इस मार्ग से पधारेंगे तो उसने उस मार्ग को साफ किया| मार्ग से कंकड़ पत्थरों को भी बीनकर मार्ग को सुन्दर बना दिया|" इसके बाद वह श्रीगोवर्धननाथजी के दर्शन करने गया और फिर उसने श्रीगुसांईजी के दर्शन किए| श्रीगुसांईजी ने उससे कहा-" आओ वैष्णव बैठो|" उस वैष्णव ने आश्चर्य से श्रीगुसांईजी से विनती की-" महाराज, आज तक आप मुझसे कुछ भी नहीं बोले| आपने आज मुझ पर कृपा की है, इसका क्या कारण है?" श्रीगुसांईजी ने कहा-"आज ही प्रथम बार तुम पुष्टिमार्ग के अनुसार चले हो, इससे हमें प्रसन्नता हुई है, अतः हमने तुमसे बोलकर प्रसन्नता की अभिव्यति की है|" उस वैष्णव ने विनय पूर्वक कहा-" मै तो नित्य श्रीगिरिराजजी की परिक्रमा करता हूँ|" श्रीगुसांईजी ने आज्ञा की -" यह तो तेरे देह का साधन है| आज तो तूने श्रीठाकुरजी के सुख का विचार किया है| पुष्टिमार्ग में तो श्रीठाकुरजी सुखी हो, वह कृति वैष्णव की होनी चाहिए|" यह सुनकर वैष्णव बहुत प्रसन्न हुआ| वह सब साधन छोड़कर सेवा करने लग गया| वह वैष्णव ऐसा कृपा पात्र था|


।जय श्री कृष्ण। 
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