Monday, March 30, 2015

Shri Gusaiji Ke Sevak Purshottamdas Ki Varta Jo Kashi Me Rahte The

२५२ वैष्णवों की वार्ता
(वैष्णव - १९)श्रीगुसांईजी के सेवक पुरुषोत्तमदास की वार्ता जो काशी में रहते थे


एक समय श्रीगुसांईजी काशी पधारे तो पुरुषोत्तमदास उनका सेवक हुआ । उनकी स्त्री भी श्रीगुसांईजी की सेवक हुई| जब श्रीगुसांईजी श्रीजगन्नाथरायजी के दर्शनाथ पधारे तो पुरुषोत्तमदास भी संग ही आए| पुरुषोत्तमदास ने श्रीगुसांईजी को सरवड़ी महाप्रसाद आरोगवाया । अब तक वल्लभकुल के बालक पुरुषोत्तमदास क्षेत्र में वैष्णवों के हाथ का सरवड़ी महाप्रसाद आरोगते रहे थे| लेकिन पुरुषोत्तमदास की कृपा से अभी तक श्रीजगन्नाथ राय का सरवड़ी महाप्रसाद वल्लभकुल के बालक आरोगते है| जब श्रीगुसांईजी श्रीगोकुल में पधारे तो पुरुषोत्तमदास सम्पूर्ण खटला को संग लेकर श्रीगुसांईजी के संग में श्रीगोकुल आये| श्रीगोकुल में रहकर श्रीगुसांईजी के श्रीमुख से कथा श्रवण करते थे| एक दिन पुरुषोत्तमदास ने श्रीगुसांईजी से पूछा-" महाराज, मर्यादा मार्ग में और पुष्टिमार्ग में भेद क्या है?" श्रीगुसांईजी ने आज्ञा की -" मर्यादा मार्ग में साधन और क्रिया तथा कर्मबल एवं कर्मफल की इच्छा व् साधन की मुख्यता होती है| उसी का नाम मर्यादा मार्ग है| पुष्टिमार्ग में स्नेह पूर्वक कृष्ण सेवा मुख्य है| भगवदीय का सत्संग और केवल भगवद्नुग्रह का बल तथा केवल निस्साधन पना व् भगवदधर्म मुख्य है । वे लौकिक और वैदिक कर्म लोगो को दिखाने के लिए करते है| मुख्यता भगवद धर्म की है| उसी को पुष्टिमार्ग कहा जाता है । यह सुनकर पुरुषोत्तमदास बहुत प्रसन्न हुए । उन्होंने सिद्धान्त रहस्य आदि ग्रंथो को श्रीगुसांईजी के पास ही सीखा । श्रीठाकुरजी पधारकर वे सेवा करने लग गए । वे भगवद रस संबंधी बातें अष्ट प्रहर श्रीगुसांईजी से सुनते रहते थे| एक दिन पुरुषोत्तमदास ने पूछा -महाराज, श्रीठाकुरजी पीताम्बर क्यों धारण करते हैं ? श्रीस्वामिनीजी नील वस्त्र क्यों धारण करती हैं ?" श्रीगुसांईजी ने आज्ञा की -" श्रीस्वामिनी गौरवण हैं, वे कंचन वर्णी कही जाती हैं| उनके बिना श्रीठाकुरजी से रहा नहीं जाता हैं-जैसे श्लोक "रूपं तवैतदति सुन्दर नील मेध प्रोधत्तदिन्मदहर व्रज भूषणाडींग| एतत समानमिति पीतवरं दुकूल मूरावुरस्यपि बिभर्ति सदास नाथ:||" इसलिए श्रीठाकुरजी पीताम्बर धारण करते हैं| श्रीठाकुरजी का श्यामवर्ण है, जिसमें अगाधरस भरा हुआ है, उसके बिना श्रीस्वामिनीजी नहीं रह सकती हैं अतः श्रीस्वामिनीजी नीलाम्बर धारण करती हैं| यह सुनकर पुरुषोत्तमदास इस रस में मग्न हो गए| ऐसी कितनी ही बातें पुरुषोत्तमदास ने श्रीगुसांईजी से ग्रहण की हैं । वे श्रीगुसांईजी के चरणविन्दों को छोड़कर कही भी नहीं जाते थे| वे पुरुषोत्तमदास श्रीगुसांईजी के ऐसे कृपा पात्र भगवदीय थे|

।जय श्री कृष्ण। 
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