Wednesday, May 11, 2016

Shree Gusaiji Ke Sevak Haridas Tatha Mohandas Ki Varta


२५२ वैष्णवो की वार्ता
(वैष्णव - १३८)श्रीगुसांईजी के सेवक हरिदास तथा मोहनदास की वार्ता

ये हरिदास अपने घर में श्रीठाकुरजी की सेवा करते थे और मोहनदास उनके घर में आकर उतरे थे| वे दोनों रात-दिन भगवद् रस में छके रहते थे| हरिदासजी मोहनदास में बहुत आसक्त हुए| वे मोहनदास के बिना एक क्षण भी नहीं रह सकते थे| वे भगवद सेवा करते थे और ग्रन्थ देखते रहते थे| हरिदासजी श्रीठाकुरजी का आविर्भाव मोहनदास में मानते थे| जब भी मोहनदास जाने की कहते थे, यह सुनकर हरिदास को मूर्च्छा आ जाती थी| ऐसी भावना करते रहते थे की मोहनदास जीवन पर्यन्त यहाँ से नहीं जावे| एक दिन मोहनदास ने सवेरे जाने का निच्छय कर ही लिया| अत: हरिदासजी ने अपनी स्त्री से कहा -"तू घर, श्रीठाकुरजी और सन्तान सभी की सँभार रखना, क्योकि मोहनदास के यहाँ से जाने पर मेरे प्राण नहीं रहेंगे|" उसकी स्त्री ने विचार किया - " ऐसा उपाय करना चाहिए ताकि मोहनदास यहाँ से न जाए| तभी मेरे पति पति के प्राण रह सकते हैं| उसने रात में अपने बेटे को विष दे दिया| उस बेटे ने रात्रि के अन्तिम प्रहर में प्राण त्याग दिये| वह स्त्री रोने लगी| उस समय मोहनदास जाने की तयारी कर रहे थे| मोहनदास ने तैयारी करना छोड़कर उस स्त्री से पूछा -"रात्रि को तो तुम्हारा बच्चा बिलकुल ठीक था, सही बात बताओ, क्या हुआ है?" हरिदास की स्त्री ने सारी बात सच - सच बता दी| यह सुनकर मोहनदास चकित हो गए उसने विचार किया - "इनका कितना प्रगाढ़ प्रेम है और में कितना निष्ठुर हुँ| यह विचार कर प्रभु का नाम स्मरण करते हुए उस बालक के कान में अष्टाक्षर मंत्र कहा ; वह बालकजीवित हो गया| इसके बाद तो मोहनदास ने ऐसा दृढ निश्चय किया की यदि हरिदास धक्का देकर भी निकलेगा तो भी नहीं जाऊंगा| फिर जन्म पर्यन्त हरिदास के घर में ही रहे| हरिदास और उनकी स्त्री ऐसे कृपा पात्र थे जिनने वैष्णव का संग न छूट जाय, इसलिए अपने पुत्र को विष दे दिया| श्रीठाकुरजी हरिदास का प्रेम देखकर बहुत प्रसन्न हुए| इनकी वार्ता को कहा तक कहें|
| जय श्री कृष्णा |





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