Friday, February 26, 2016

Shri Gusaiji Ke Sevak Dev Brahman Bangali Ki Varta

२५२ वैष्णवो की वार्ता
(वैष्णव १११) श्रीगुसांईजी के सेवक देव ब्राह्मण बंगाली की वार्ता


देव ब्राह्मण बंगाल से ब्रजयात्रा करने के लिए आए । यहाँ श्रीगोवर्धननाथजी के दर्शन कर के उनका मन बहुत प्रसनन हुआ । उन्होंने श्रीगुसांईजी के दर्शन किए और उनसे विनम्र निवेदन किया- '' मुझे अपनी शरण में ले लीजिए ।'' श्रीगुसांईजी ने कृपा समर्पण कराया और उस ब्राहमण को यहाँ रख क्र पुष्टिमार्गीय सेवा प्रणाली की शिक्षा दी । इसके बाद वह ब्राह्मण श्रीगुसांईजी से आज्ञा लेकर बंगाल को गया । वहाँ उसने अपने घर में श्रीनाथजी की सेवा करने लगा । एक दिन उस ब्राह्मण ने उड़द की दाल के बड़े बनाए । फिर उसके मन में विचार हुआ- ''कुछ मिष्ठान्न तो अवश्य होना चाहिए । उसके यहाँ द्रव्य का बहुत संकोच था अत: थोड़ा सा गुड लाकर श्रीनाथजी को भोग समर्पित किया । श्रीनाथजी साक्षात अरोगने के लिए पधारे । वहाँ श्रीगिरिराजजी ऊपर राजभोग रखे ही रह गए । आरोगे नहीं । भीतरिया ने यथावसर अनवसर करा दिया । उस दिन श्रीगुसांईजी गोकुल में विराजते थे । श्रीनाथजी ने गोकुल में श्रीगुसांईजी को जताया की " आज तो हम भूखे हैं । हम बंगाल में देव ब्राह्मण के यहाँ उड़त के बड़ा और गुड आरोगे रहे थे । पीछे से भीतरिया ने राजभोग रखा और यथावसर अनौसर करा दिया ।" श्रीगुसांईजी उसी समय श्रीगोकुल से श्रीगिरिराजजी पधारे और सामग्री तैयार करा क्र राजभोग धराया । उस देव ब्राह्मण को पत्र लिखा " तुमने अमुक दिन श्रीठाकुरजी को गुड़ और बड़ा भोग घरे थे सो श्रीनाथजी ने भली भांति से अरोगे हैं ।" यह पत्र पढकर देव ब्राह्मण बहुत प्रसन्न हुआ । वह दो थान बंगाली मलमल के लेकर चला और आकर श्रीगुसांईजी से विनती की - " ये थान अंगीकार करें ।" श्रीगुसांईजी के आज्ञा की - " ये थान तो श्रीनाथजी के योग्य हैं ।" इस ब्राह्मण ने कहा - " एक दूसरा थान भी लाया हूँ,उसे आप अंगीकार करें ।' श्रीगुसांईजी ने वैसा ही किया । श्रीनाथजी को मलमल का बागा धारण कराया और देव ब्राहमण को दर्शन कराए । सो वे ब्राह्मण ऐसे कृपा पात्र भगवदीय थे |
|जय श्री कृष्णा|




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1 comments:

  1. ir u translate the web site in English it would be better. many south indian can understand and other world people.

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