Wednesday, January 20, 2016

Shri Gusaiji Ke Sevak Ek Seth Aur Virakt Ki Varta

२५२ वैष्णवों की वार्ता
(वैष्णव ९९ )श्रीगुसांईजी के सेवक एक सेठ और विरक्त की वार्ता


ये दोनों सेठ और विरक्त श्रीगुसांईजी के साथ ब्रजयात्रा के लिए चले| श्रीगुसांईजी के संग वैष्णव मण्डल भी बहुत था| विरक्त वैष्णव चुटकी माँगकर निर्वाह करता था| एक दिन विरक्त वैष्णव ने रसोई की| उस रसोई की मेंड पर से कुत्ता निकल गया| उसने श्रीगुसांईजी से व्यवस्था ली| श्रीगुसांईजी ने आज्ञा की -" तेरे रसोई छुइ नहीं है|" दूसरे दिन सेठ की रसोई की मेंड पर से कुत्ता निकल गया| तब सेठ ने भी श्रीगुसांईजीसे व्यवस्था चाही| श्रीगुसांईजी ने आज्ञा की - " तेरी रसोई छू गई है|" दूसरी सामग्री मँगाकर रसोई की गई| दूसरे दिन समय पाकर सेठ ने श्रीगुसांईजी से विनती की -" हे महाराजाधिराज, उस विरक्त वैष्णव की रसोई के न छूने और मेरी रसोई के छू जाने की व्यवस्था का क्या कारण है? कुत्ता तो दोनों की रसोई की मेंड पर से गुजरा था|" श्रीगुसांईजी ने आज्ञा की - " इसके पास द्रव्य नहीं है| यह तो पच्चीस घर में माँगकर लाता है, तब निर्वाह करता है| तुम्हारे पास द्रव्य विधमान है| तुम चाहो जिस समय, जितनी चाहो उतनी रसोई करा सकते हो| इतना ही तारतम्य है| इसलिए इसकी रसोई का छूआ नहीं माना गया और आपके लिए छूने की व्यवस्था दी गई| सेठ के मन में जो द्रव्य अभिमान था, वह मिट गया| उसने यह निश्चय किया -" यदि द्रव्य हो और भगवद्पर्ण नहीं हो तो उस द्रव्य से अनर्थ ही पैदा होता है| " उस विरक्त के मन में चिन्ता रही कि मेरे पास द्रव्य नहीं है| अतः उसकी चिन्ता तो मिटगई| यदि इसके पास बहुत द्रव्य होता तो इसकी बुद्धि भी मेरी जैसी हो जाती| वह सेठ मन में बहुत प्रसन्न हुआ वह सेठ एयर विरक्त दोनों ही श्रीगुसांईजी के कृपा पात्र थे| उन्ही की कृपा से सेठ को तत्काल तत्व का ज्ञान हो गया|

।जय श्री कृष्ण।


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1 comments:

  1. जय हो कृपानिधान गोसाईंजी परम दयाल की। जै श्री कृष्णा।

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