Thursday, August 13, 2015

Shri Gusaiji Ke Sevak Gulabdas Kshtriy Ki Varta


२५२ वैष्णवों की वार्ता
(वैष्णव ५५)श्रीगुसांईजी के सेवक गुलाबदास क्षत्रिय की वार्ता

गुलाबदास श्रीगुसांईजी के सेवक थे| श्रीगुसांईजी की शरण में जाने के कुछ दिन बाद वे म्लेच्छ देश में जाकर रहे और भ्रष्ट हो गए| भक्ष्याभक्ष्य का सेवन करने लग गए| अपना नाम बदल कर गुलाब खाँ रख लिया| श्रीगुसांईजी ने उनके बारे में सुना तो उनको बुलाने के लिए उनके पास एक वैष्णव को भेजा| उस वैष्णव ने जाकर कहा-" गुलाबदास, तुमको श्रीगुसांईजी ने बुलाया है|" उस समय गुलाबदास एक वैश्या के पास बैठे थे|" उन्होंने वैष्णव से पूछा- "मै इतना भष्ट हो गया हूँ, तब भी श्रीगुसांईजी मुझे याद करते है?" यह कहकर उसे विरहताप हुआ, उसके प्राण छूट गए| वैष्णव यह स्थिति देखकर वहाँ से चल दिया| जब श्रीगुसांईजी के पास आया तो उसने देखा कि गुलाबदास श्रीगुसांईजी को पंखा कर रहा है| उस वैष्णव का सारा सन्देह दूर हो गया| वह गुलाबदास श्रीगुसांईजी का ऐसा कृपा पात्र था जिसके कर्म विरहताप में जल गए और शुद्ध होकर भगवल्लीला में लीन हो गया|

।जय श्री कृष्ण।


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