Thursday, June 18, 2015

Shri Gusaiji Ke Sevak Gopaldas Ki Varta

२५२ वैष्णवों की वार्ता
(वैष्णव ४२)श्रीगुसांईजी के सेवक गोपालदास की वार्ता




गोपालदास बडनग़रा नागर थे| वे बड़ नगर के निवासी थे| श्रीगुसांईजी के बड़नगर पधारने पर उनके सेवक हुए थे| श्रीठाकुरजी की सेवा पधरा कर सेवा करने लगे| गुजरात से वैष्णव मण्डल ब्रज में गया तो उस मण्डल के साथ गोपालदास श्रीगोकुल गए| वहाँ श्रीनवनीतप्रियजी के दर्शन किए| उस मण्डल में पाँच सौ वैष्णव थे, सभी ने राजभोग के दर्शन किए| साथ ही सभी ने श्रीगुसांईजी के दर्शन भी किए| श्रीगुसांईजी ने भोजन करके गोपालदास के लिए अपनी जूठन की पत्तल प्रदान की| तब गोपालदास ने बाहर आकर सभी वैष्णव मण्डल को महाप्रसाद लेने का आग्रह किया| गोपालदास ने उस जूठन में से पाँच सौ पत्तलों पर प्रसाद रखा, तो भी उसमें जूठन घटी नहीं| गोपालदास ने स्वयं ने भी महाप्रसाद लिया, तब भी जूठन घटी नहीं| गोपालदास उठे नहीं| श्रीगुसांईजी ने पूछा-" गोपालदास, कैसे बैठे रह गए?" गोपालदास ने कहा-" महाराज, जब तक इस पत्तल पर महाप्रसाद रहेगा, मै कैसे उठ सकता हूँ|" श्रीगुसांईजी तुरन्त स्नान करने पधारे तो पत्तल की जूठन घट गई| गोपालदास भी उठ बैठे| श्रीगुसांईजी ने कहा-" श्रीनाथजी तुम्हारा मनोरथ पूर्ण करते हैं|" गोपालदास ने कहा-" महाराज वे सम्पूर्ण विश्व की पूर्ण तृप्ति करते हैं, फिर मेरी कामना पूर्ण क्यों नहीं करेंगे? आप की कृपा से मेरे सब काम पूर्ण हैं|" वह गोपालदास श्रीगुसांईजी का ऐसा कृपा पात्र था|


।जय श्री कृष्ण। 
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