Monday, April 27, 2015

Shri Gusaiji Ke Sevak Suratvasi Kayasth Ki Varta

२५२ वैष्णवों की वार्ता
(वैष्णव २७)श्रीगुसांईजी के सेवक सूरतवासी कायस्थ की वार्ता


मोतीराम कायस्थ सूरत के सूबेदार की नौकरी करता था| वह राजनगर में किसी कार्य से आया था, वहाँ श्रीगुसांईजी का सेवक हुआ| कुछ दिन बाद वह सूरत के सूबेदार के साथ आगरा गया था तो पृथ्वीपति से मिला था| उस सूबेदार ने आगरा से लौटते समय गोवर्धन में मुकाम किया तो मोतीराम गोपालपुर में श्रीनाथजी के दर्शनों के लिए गया तो वहाँ राजभोग हो चुके थे| उस कायस्थ ने वहाँ श्रीगुसांईजी के दर्शन किए| उसने विचार किया कि सूबेदार का तो जल्दी ही प्रस्थान है अतः श्रीनाथजी के दर्शन नहीं हो पायेँगे| वह भण्डारी से मिला और बोला-" में साठ हजार रुपया की सेवा करूँगा लेकिन उत्थापन के दर्शन दो घडी पहले हो तो अधिक अच्छा रहे| भण्डारी ने यह बात श्रीगुसांईजी से निववेदन की| श्रीगुसांईजी ने दो घडी विलम्ब से उत्थापन कराये| मोतीराम सूबेदार के साथ ही प्रस्थान कर गया| उसने जाकर कुम्हेर में मुकाम किया| मोतीराम का मन उदास हो गया| उस सूबेदार ने मोतीराम से उदासी का कारण पूछा| मोतीराम ने सारे समाचार कह दिये| उसने कहा-" तू दर्शनों के लिए साठ हजार रुपया खर्च करने के लिए उधत था| में तेरे ऊपर बहुत प्रसन्न हूँ अतः तुम जाकर श्रीनाथजी के दर्शन कर आओ| मोतीराम प्रातः काल श्रीनाथजी के दर्शन के लिए गोपालपुर आया और उसने राजभोग के दर्शन किये| वह श्रीनाथजी के दर्शन करके बहुत प्रसन्न हुआ| उसने महाप्रसाद भी लिया| अपने भाग्य की सराहना की| उसने एक लाख रूपये का हिरा लेकर श्रीनाथजी की चिबुक(ठोड़ी) पर आमरण कराया| वह मोतीराम वैष्णव श्रीगुसांईजी का ऐसा कृपा पात्र था जिसकी आरति को श्रीनाथजी सहन नहीं कर सके| उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया कि धन से ही सब कार्य सिद्ध नहीं होते है| केवल भगवत कृपा से ही सिद्धि होती है| वह मोतीराम श्रीगुसांईजी का ऐसा कृपा पात्र था|

।जय श्री कृष्ण।


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