Monday, April 6, 2015

Shri Gusaiji Ke Sevak Mathuravasi Vaishnav Kshtri Ki Varta

२५२ वैष्णवों की वार्ता 
(वैष्णव - २१) श्रीगुसांईजी के सेवक मथुरावासी वैष्णव क्षत्री की वार्ता



वे क्षत्री वैष्णव श्रीठाकुरजी पधराकर भलीभाँति सेवा करते थे, भगवद वार्ता भी बहुत अच्छी करते थे| पुष्टिमार्ग के ग्रन्थ और भावार्थ वे स्वयं श्रीगुसांईजी से सुनते थे| मथुरा के अन्य वैष्णव भी भगवद वार्ता सुनने के लिए उसके घर आते थे| वह क्षत्री वैष्णव प्रतिदिन चना सेककर अपने हाथ से भोग धरता था| स्वयं अपने हाथ से वैष्णव मण्डली में बाँटता था| इस प्रकार करते करते बहुत दिन व्यतीत हो गए| एक धनिक सेठ उस वैष्णव मण्डली में आने लगा| वह चना प्रसाद ले तो लेता था लेकिन उन्हें इधर-उधर डाल देता था| श्रीमहादेवजी वैष्णव का रूप बनाकर उस वैष्णव मण्डली में प्रतिदिन आते थे| किसी को भी खबर नहीं थी लेकिन क्षत्री वैष्णव उन्हें पहचानता था| जब वह धनी वैष्णव चनों को फेंकता था तो श्रीमहादेवजी स्वयं उन चनों को बीन लेते थे| एक दिन उस क्षत्री वैष्णव ने श्रीमहादेवजी को चने बीनते देखा| उस क्षत्री वैष्णव ने उस धनिक सेठ से वैष्णव मण्डली में आने से मनाकर दिया| जब वह धनिक सेठ श्रीगोकुल गया तो वहाँ उससे श्रीगुसांईजी ने कोई बात नहीं की| वे बोले ही नहीं| श्रीनवनीतप्रियजी ने उस सेठ को दर्शन नहीं दिये| अब तो वह सेठ पुनः मथुरा में आया और उस क्षत्री वैष्णव के पाँवो में पड़ गया| क्षत्री वैष्णव ने कहा- " तुमने भगवत प्रसाद का अपमान किया है अतः तुम्हे वैष्णव मण्डली में आने का अधिकार नहीं है । फिर तो उस सेठ ने बड़ी दीनता दिखाई और उस वैष्णव के पैरों पर गिर पड़ा| क्षत्री वैष्णव को दया आ गई उसने उस सेठ को पुनः मण्डली में आने के लिए कह दिया| अब तो उसको श्रीनवनीतप्रियजी व् श्रीगुसांईजी ने भी दर्शन दिये| वैष्णवों को जाती - व्यव्हार के अनुसार प्रसाद में बाधा नहीं करनी चाहिए| प्रसाद का सदा सम्मान करना चाहिए| वह क्षत्री वैष्णव श्रीगुसांईजी के ऐसे कृपा पात्र थे जिनने करोड़पति सेठ का भी तिरस्कार कर दिया| वे क्षत्री वैष्णव ऐसे कृपा पात्र भगवदीय थे|


।जय श्री कृष्ण।
 
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