Tuesday, April 21, 2015

Shri Gusaiji Ke Sevak Bai Kshtrani Ki Varta

२५२ वैष्णवों की वार्ता
(वैष्णव - २५)श्रीगुसांईजी की सेवक बाई क्षत्राणी की वार्ता


वह क्षत्राणी भोली बहुत थी| वह श्रीठाकुरजी की सेवा भलीभाँति से करती थी और श्रीठाकुरजी भी उसे बालभाव जनाते थे| कभी उसकी छाती से लिपट जाते, कभी उसकी गोद में बैठ जाते और घड़ी-घड़ी में भूखा होकर खाने को मांगने लग जाते| वे उस बाई को बहार नहीं जाने देते थे| जब वह बाई बाहर जाती तो श्रीठाकुरजी रुदन करने लग जाते| इस प्रकार बालभाव जनाते रहते थे| एक दिन घर में बिल्ली लड़ने लगी, तो श्रीठाकुरजी ने उस बाई से कहा -" मुझे बहुत डर लगता है|" ऐसा कहकर उस बाई से लिपट गए| उस बाई ने कहा-"तुमने पूतना आदि दैत्य मारे थे तब तो नहीं डरे अब क्यों डरते हो?" यह सुनकर श्रीठाकुरजी ने उस बाई से बोलना बंद कर दिया| तीन दिन तक कुछ भी नहीं बोले तो बाई रोने लगी और बहुत प्रकार से प्राथना करके उन्हें रिझाया तो श्रीठाकुरजी पुनः बोलने लगे| अतः वैष्णव को यह भाव नहीं रखना चाहिए कि श्रीठाकुरजी को कोई भूख - प्यास नहीं लगती है| उन्हें सर्व सामथ्यवान् समझकर जो श्रीठाकुरजी की सेवा करता है, उसकी सेवा तो निष्फल होती है| श्रीमहाप्रभुजी ने निबंध में कहा है- " माहात्म्य ज्ञान पूवस्तु सुदढ़: सर्वतोड़धिक:। स्नेहो भतिरिति प्रोता तया मुतिनचान्यथा||"इसका आशय है कि माहात्म्य ज्ञान पूर्वक सुदुढ़ सर्वाधिक स्नेह श्रीठाकुरजी में रखना चाहिए| जैसे कोई राजा होता है तो उसकी माता को तो ऐसा ही लगता है कि उसका बेटा भूखा होगा| मेरे बेटे को ठण्ड लगती होगी| इस रीति से श्रीठाकुरजी के ऊपर स्नेह रखना चाहिए| सो वह क्षत्राणी ऐसी कृपा पात्र थी|

।जय श्री कृष्ण।


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