Monday, March 2, 2015

Shri shrigusainiji ke sevak jo rajnagar me rahte ki varta


२५२ वैष्णवों की वार्ता
(वैष्णव - १२ ) श्री श्रीगुसांईजी के सेवक जो राजनगर में रहते की वार्ता




राजनगर निवासी वैष्णव का नियम था - " दो चार वैष्णवों को प्रसाद लिवाकर स्वयं प्रसाद लेता था । यदि कोई वैष्णव प्रसाद लेने नहीं आता था तो दोनों स्त्री पुरुष प्रसाद नहीं लेते थे । एक बार यह वैष्णव परदेश गया और अपनी स्त्री को कह गया था कि वैष्णवों को नित्य ही अवश्य प्रसाद लिवाया करना । जितने वैष्णवों को प्रसाद लिवाए , उतने ही पैसे इस गागर में डालते जाना । उस स्त्री ने ऐसा ही किया । कुछ दिन बाद वैष्णव परदेश से लौटा , तो उसने गागर के पैसे गिने । उसमें पाँच मोहर देखने को मिली । वैष्णव ने अपनी पत्नी से मोहरों के बारे में पूछा तो उसने गागर में केवल पैसे डालने की बात को स्वीकार किया । मोहर उसमें नहीं डाली थी । कुछ दिन बाद श्रीगुसांईजी राजनगर पधारे तो उस वैष्णव ने उनको सारा वृतान्त सुनाया । श्रीगुसांईजी उसकी शंका का समाधान करते हुए उसे समझाया - " जिन वैष्णवों की तुम्हारी पत्नी ने प्रसाद लिवाया है , उनमें पाँच भगवदीय तादृशी आए होंगे । अत : पैसे के स्थान पर पाँच रत्न हो गए । अत : जैसे भी बने प्रत्येक वैष्णव को वैष्णवों का आदर करना चाहिए ।" श्रीगुसांईजी की आज्ञा को सुनकर वैष्णव बहुत प्रसन्न हुआ । वह वैष्णव श्रीगुसांईजी का ऐसा कृपा पात्र था जिसका रत्नों के द्रारा वैष्णवों के स्वरूप का ज्ञान श्रीठाकुरजी ने कराया |

।जय श्री कृष्ण।
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2 comments:

  1. please publish all vartas in common language English

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  2. We will try and get it translated in English. Jai Shri Krishna.

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