Monday, September 25, 2017

Shri Gusaniji Ke Sevak Khambhaat Nivaasi Maganabhai Ki Vaarta


२५२ वैष्णवों की वार्ता   
(वैष्णव - १६३ श्रीगुसांईजी के सेवक खंभात निवासी मगनभाई की वार्ता


मगनभाई वैष्णव जाती से वैश्य थे| एक बार श्रीगुसांईजी खंभात पधारे थे| माधवदास दलाल के यहां ठहरे थे| वहां बहुत से वैष्णव आते थे| वैष्णवों की भीड़ देखकर माधवदास से मगन भाई ने पुछा - " श्रीगुसांईजी की सेवक हो जाने पर व्यक्ति में क्या विशेषता आ जाती है|" माधवदास ने कहा - "इनका शिष्य हो जाने पर नया जन्म हो जाता है| इसी देह में जन्म में बदलाव आ जाता है| श्रीठाकुरजी की अनूठी कृपा भी हो जाती है| उस जिव को श्रीठाकुरजी अपना मान लेते हैं|" यह जानकार मगनभाई श्रीगुसांईजी के सेवक हो गए, मगनभाई के पास द्रव्य बहुत था अत: उन्होंने श्रीगुसांईजी के दर्शन करके उन्हें एक लाख रुपया भेंट कर दिये| मगनभाई के मन में एक विचार आया की ब्रह्म सम्बंध से नया जन्म होता है, इसकी परीक्षा करनी चाहिए| मगन भाई ने सोचा - "अमुक ब्राह्मण मेरे पास पाँच हजार रुपया रखकर तीर्थयात्रा करने के लिए गया है, मैंने उसके जाने के बाद ब्रह्म सम्बंध ले लिया तो मेरा दूसरा जन्म हो गया| अब मैं इस जन्म में उसका रुपया देना स्वीकार नहीं करूँगा| इसी से परीक्षा हो जाएगी|" वह ब्राह्मण तीर्थयात्रा से लौटकर आया तो उसने मगनभाई से पाँच हजार रुपया माँगे तो मगनभाई ने कहा - "मेरे पास तुमने इस जन्म में पाँच हजार रूपये रखे ही नहीं|" जब बार बार रुपया माँगने पर भी मगनभाई ने इस जन्म में रुपया लेना स्वीकार नहीं किया तो वह राजा के पास पुकार करने गया राजा ने इसकी बात सूनी और मगनभाई को बुलाकर उसके रूपये लौटाने को कहा लेकिन इस जन्म में रूपये लेना स्वीकार नहीं किया| इस पर राजा ने एक लोहे की पाँच सेरी गर्म कराकर मगनभाई के हाथों में रखवाई| मगनभाई ने श्रीगुसांईजी का नाम लेकर स्मरण करके कहा - "प्रभो मेरा ब्रह्म सम्बंध लेने से दूसरा जन्म हो गया है| मैंने ब्रह्म सम्बंध से पहले अथार्त् इस जन्म से पहले रूपये लिए थे, इस जन्म में नहीं लिये, इस सत्यता के लिए आपकी शरण में हूँ|" कहकर मगनभाई ने गर्म पाँच सेरी को हाथ पर रख लिया| उसके हाथ नही जले| राजा ने कहा पांच सेरी पटक दो ब्राह्मण ने कहा - "पाँच सेरी ही नहीं है, हाथ कैसे जलते?" उसी समय उस ब्राह्मण ने पाँच सेरी को दोनों हाथों से छू लिया| उसके हाथों में जलने से फफोले हो गए| राजा ने उसी समय ब्राह्मण का घर लूट लेने का आदेश दिया| उसी समय मगनभाई ने कहा - "इसका घर नहीं लूटा जावे| वास्तव में यह झूठ नहीं बोल रहा है| वास्तव में तो मैंने ही सैध्दान्तिक पक्ष की परीक्षा की थी| मगनभाई ने राजा को साडी बात सच सच बता दी| इस पर सारी सभा को बड़ा आश्चर्य हुआ| उस राजा ने ब्राह्मण को मुक्त कर दिया| श्रीगुसांईजी को खंभात में पधराकर राजा और ब्राह्मण अपने परिवार सहित श्रीगुसांईजी के सेवक हो गए| श्रीठाकुरजी पधरा कर सेवा करने लगे| मगनभाई भी श्रीठाकुरजी पधराकर मार्ग की रीति के अनुसार सेवा करने लग गए| मगनभाई को श्रीगुसांईजी का इस विश्वास था|                                                                               
                                                                      | जय श्री कृष्ण|
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