Sunday, September 24, 2017

Shri Gusaniji Ke Sevak Ek Bai Ki Vaarta


२५२ वैष्णवों की वार्ता   
(वैष्णव - १६३ श्रीगुसांईजी की सेवक एक बाई की वार्ता

वह बाई गोलबाड़ में रहती थी| श्रीगुसांईजी जब द्वारिका पधारे तो उसके गाँव गोलबाड़ में मुकाम किया| वह बाई जल भरने को जा रही थी, उसे मार्ग में श्रीगुसांईजी के दर्शन हो गए| उसे साक्षत् पूर्ण पुरुषोत्तम स्वरुप में दर्शन हुए| वह बाई श्रीगुसांईजी की शरण में आई वह श्रीठाकुरजी पधरा कर सेवा करने लगी| उस बाई का एक बीटा बटमार था, जो भी राहगीर मिलता था, उसे मूट लेता था और उसे मार कर उसका धन ले आता था| उस बाई ने अपने बेटे से कहा- "बेटा, तू किसी वैष्णव को मत मारना|" उसके बेटे ने कहा - "मात: मैं कैसे पहिचानूँगा की यह वैष्णव है|" उस बाई ने कहा - "जिसको भी तू लूटे, उसे पकड़ कर यहां ले आया कर, मैं उसे पहचान लिया करुँगी|" उसका बेटा माता की आज्ञा का पालन करने लग गया| रास्ते से राहगीर को पकड़कर लाता था और अपनी माता को दिखा देता था| एक दिन वह ग्यारह व्यापारियों को पकड़ लाया| उनमें एक वैष्णव व्यापारी था| उसकी माँ ने कहा - "तू इस वैष्णव व्यापारी को छोड़ दे|" उस वैष्णव व्यापारी ने कहा - "ये दस तो मेरे भाई है| मैं तो इनके पीछे प्राण तक दे सकता हूँ|" उस बाई ने उस वैष्णव के आग्रह को देखकर सभी को छुड़वा दिया| उस बाई ने उस वैष्णव से कहा - "तुम रसोई करो और महाप्रसाद लेकर जाओ| उस वैष्णव ने रसोई की और अपने साथ अन्य दसों को भी महाप्रसाद लिवाया| इसके बाद उस बाई को ओर उसके बेटे को महाप्रसाद लिवाया| उस बाई के बेटे के सहयोगी १५० एक सौ पचास घुड़सवार साथ फिरा करते थे, उन सभी को प्रसाद लिवाया| तब भी महाप्रसाद टूटा (बीता) नहीं| उस बाई के बेटे ने पूछा - "तुमने रसोई तो कुल ग्यारह मनुष्यों की बनाई थी, परन्तु इतने लोगों को महाप्रसाद की पूर्ती कैसे हुई? अभी तो बहुत माह प्रसाद विद्यमान है| इसका क्या कारण है?" तब उस वैष्णव ने कहा - "जो व्यक्ति अपने हक़ का खाता है और कमा कर खाता है, उसके यहां कभी भी कमी नहीं आती है|" तब वह पटेल (बटमार) बोला - "हमको भी रास्ता बताओ, हम कैसे करें?" तब उस वैष्णव ने कहा - "तुम लूटपाट चोरी करना बन्द कर दो, खेती करके खाओ| तुमको ऐसा ही होगा|" तब उस बाई के बेटा पटेल ने बटमारी को छोड़ दिया अपने अन्य साथियों से भी लूट - पाट चोरी करना छुड़ा दिया| वे खेती करने लग गए| सो वह बाई श्रीगुसांईजी की ऐसी कृपा पात्र थी जिनके संग से सारा ग्राम श्रीगुसांईजी का सेवक हो गया|
                                                                    | जय श्री कृष्ण|
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