Sunday, May 10, 2015

Shri Gusaiji Ke Sevak Gujaratvasi Ek Kshtriy Vaishnav Ki Varta

२५२ वैष्णवों की वार्ता
(वैषणव ३१)श्रीगुसांईजी के सेवक गुजरातवासी एक क्षत्रिय वैष्णव की वार्ता


ये गुजराती क्षत्रिय वैष्णव चाचा हरिवंशजी के साथ गुजरात जा रहे थे| ये क्षत्रिय वैष्णव जब भगवद वार्ता करते थे तो भगवद रस में निमग्न हो जाते थे| उनकी रहस्य वार्ता को स्वयं श्रीगोवर्धननाथजी सुना करते थे| एक बार ये क्षत्रिय वैष्णव मार्ग में भटक कर चाचाजी से बिछुड़ गए| इनको गाँव में एक वैष्णव इन्हे अपने घर लिवा कर ले गया। वह वहाँ भगवद वार्ता करने बैठ गया| इस क्षत्रिय वैष्णव को ऐसा रसावेश हुआ कि इसे देहानुसंधान ही नहीं रहा| इधर चाचाजी इस वैष्णव को ढूँढ़ते ढूँढ़ते यहाँ आ पहुँचे तो इसे भगवद रस में निमग्न पाया| भगवद वार्ता करते करते सारी रात गुजर गई| श्रीगोवर्धननाथजी खड़े खड़े इनकी वार्ता सुनते रहे| श्रीगोवर्धननाथजी का भी जागरण हो गया लेकिन इसे कोई देहानुसंधान नहीं हुआ| चाचाजी भी उनके पास जाकर खड़े रहे| इसे कुछ भी ज्ञान नहीं हुआ| चाचाजी ने उसे हाथ पकड़कर उठाया, तब इसे देहानुसंधान हुआ| चाचाजी ने कहा-" तुम तो भगवद रस में मग्न हो रहे हो, श्रीगोवर्धननाथजी भी सारी रात खड़े रहे है| आपके इस तरह भगवद रस में लीन होने से श्रीठाकुरजी को बहुत श्रम होता है| अतः सँभलकर भगवद वार्ता किया करो| यह कहकर चाचाजी उनको ले गए| वह क्षत्रिय वैष्णव ऐसा कृपा पात्र था जिसकी वाणी को सुनने के लिए श्रीगोवर्धननाथजी स्वयं पधारते थे| उसके भाग्य की सराहना कहाँ तक की जाए?

।जय श्री कृष्ण।


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