Monday, September 4, 2017

Shri Gusaiji Ke Sevak Jada KrushnaDas ki Varta

(वैष्णव - २५२ ) 
 श्रीगुसांईजी के सेवक जाड़ा कृष्णदास की वार्ता
(प्रसंग - १ )
उनको सभी वैष्णव चाचा जाड़ा कहते | वे बहुत चतुर थे | सब सन्त महंतों की परीक्षा लेते फिरते थे | एक दिन श्रीगोकुल में श्री गुसांईजी की परीक्षा लेने को आए | उस समय श्रीगुसांईजी श्रीनवनीतप्रियजी को झूला झूला रहे थे | जाड़ा कृष्णदास ने दर्शन किए तो उन्हें ऐसा लगा कभी तो श्रीगुसांईजी श्रीनवनीतप्रियजी को झुलाते हैं और श्रीनवनीतप्रियजी श्रीगुसांईजी को झुलाते हैं | जाड़ा कुष्णदास देखकर चकित रह गए| उनके मन में संदेह हुआ कि श्रीगुसांईजी और श्रीनवनीतप्रियजी में से श्रीठाकुरजी कौन है ? श्रीगुसांईजी राजभोग घर कर बाहर पधारे तब जाड़ा कृष्णदास को श्रीगुसांईजी के रोम रोम में श्रीनवनीतप्रियजी के दर्शन हुए | तब जाड़ा कृष्णदास ने श्रीगुसांईजी को दण्डवत करके विनती की " मैं बहुत दुष्ट हूँ,आपकी परीक्षा लेने के लिए आया हूँ, लेकिन प्रभो आपने मेरी परीक्षा ली और मेरा संदेह दूर किया | अब आप मुझ को शरण में लो | श्रीगुसांईजी ने कृपा करके नाम निवेदन कराया 

प्रसंग - २
फिर थोड़े दी वहाँ रहने के बाद वृन्दावन में आए और रूप सनातनजी को मिले | रूप सनातन से कहा - " श्रीठाकुरजी क्या करते हैं ?" रूप सनातन ने कहा - " श्रीठाकुरजी भोजन करा रहे हैं ?" तब जाडा कृष्णदास ने कहा " श्रीठाकुरजी कि सभी लीलाएँ नित्य हैं, वे तो एक कालाव छिछन सब लीलाएँ कर रहे हैं | तुमने केवल भोजन कर रहे हैं, ऐसा क्यों कहा? कारण समझावे | इस पर रूप सनातन ने कहा - " ऐसे दर्शन तो श्रीगोकुल मेँ श्रीगुसाईजी के यहाँ होते हैं | " जिनको श्रीगुसाईजी चाहें, उनको भी वैस दर्शन करा सकते है | यह सुनकर जाड़ा कृष्ण दास बहुत प्रसन्न हुए | ये जाड़ा कृष्णदास व्रज में फिरा करते थे | वे भगवद गुणानुवाद गाया करते थे | इन्होने इन्द्र्कोप, रास पंचाध्यायी माधव रूक्मणी केलि,आदि को पदों में रचना कर गान किया | इन्होंने कुछ भोजन संबन्धित नवीन पद बनाकर गाए | जिन से उनका प्रसंग हुआ, उनके मन की जनंदता समाप्त हो गई | 

प्रसंग - ३
एक दिन जाड़ा कृष्णदास द्वारिका की यात्रा गए | रस्ते में एक देवी देवल में जाकर सो गए | प्रात: काल एक मनुष्य बकरा लेकर आया | जाड़ा कृष्णदास ने कहा - " इस देवी पर पर सभी बकरा चढ़ाते है, सिंह कयों नहीं चढ़ाते है?" वह मनुष्य बोला - "सिंह को कैसे पकड़ा जाए?" जाड़ा कृष्णदास ने कहा - " ले मैं तुज़को सिंह पकड़कर देता हूँ तुम इस बकरा को छोड़ दो | उसने बकरा को छोड़ दिया | जाड़ां कृष्णदास जंगल जाकर सिंह को पकड़ लाए | सिंह को देखकर सब लोग भाग गए | वे जाड़ा कृष्णदास के पैरों में गीर पड़े | जादानं कृष्णदास ने उनसे कहा- " आज के बाद जीव हिंसा नहीं करनी चाहिए वे पराक्रमी थे अत : उनकी कीर्ति जग में फेल गई थी | जाड़ा कृष्णदास ऐसे पराक्रमी थे | इसका अर्थ है - " जब श्रीठाकुरजी ने जीवों को मोह करने के लिए और अपने भजन से विरत करने के लिए विचार किता तो बुद्धावतार लिया | श्रीठाकुरजी की ऐसी विपरीत इच्छा जानकर सब देवताओं ने ब्राह्मणों के घर आकर जन्म लिया | अनेक मतों को चलाया और अनेक शास्त्र वर्णित किए | उन्होंने इस बात का ध्यान नहीं किया कि श्रीठाकुरजी मोह कर रहे हैं और ठगाई करा रहे है | बुद्धिमानों ने यह विचार ही नहीं किया | श्रीठाकुरजी की सेवा करना बन्द कर दिया | पण्डित लोग कर्मवश हो गए ऐसी कर्म से अभिभूत लोगों को संसार ही फलित होता है | अन्य कोई फल नहीं होता है | " यह सुनकर जाड़ा कृष्णदास बहुत प्रसन्न हुए और कहने लगे - " आपके बिना मेरे संदेह को दूर करने की सामर्थ किसी मैं भी नहीं है | लोग जानते है कि श्रद्धा अनेक प्रकार लोगों के प्रति होती है लेकिन सच्ची श्रद्धा कहाँ होती है ? पुन : जाड़ा कृष्णदास ने प्रश्न खड़ा कर दिया तो चाचाजी ने निबंध का श्लोक कहा - अर्थ - ज्ञान निष्ठ सच्ची तब होती है, जब सर्वग होने का विश्वास होता है | कर्म निष्ठा तभी मणि जाती है जब अनेक कष्ट पड़ने पर भी कर्म में संलग्नता बानी रहे | कष्टों में भी चित में प्रसन्नता रहे | भक्ति निष्ठां तब मानी जाती है जब श्रीठाकुरजी प्रसन्न हों निष्ठां के बिना कोई भी फल नहीं होता है | यह सुनकर जाड़ां कृष्णदास का मन बहुत प्रसन्न हुआ | वे जीवन प्रयत्न गोपालपुर में रहे और श्रीनाथजी की सेवा करते रहे | वे जाड़ा कृष्णदास श्रीगीसांईजी के ऐसे कृपा पात्र थे |

                                                                    | जय श्री कृष्ण|
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1 comments:

  1. Jai shreejibawa
    ati sundar varta.

    Sanjay RAJNIKANT VYAS

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