Thursday, September 14, 2017

Shree Gusaijee ke Sevak Daamodar Daas kee do Striyon ki Vaarta


२५२ वैष्णवों की वार्ता 
(वैषणव - २२४ श्रीगुसांईजी के सेवक दामोदर दास की दो स्त्रियों की वार्ता
दामोदरदास के के घर जो भी वैष्णव आता था, उसका वे बड़ा आदर करते थे और उन्हें साग्रह प्रसाद लिवाते थे | कैसा ही स्वभाव का वैष्णव हो वे मन में कभी अनादर का भाव नहीं लाते थे | एक बार ईश्वरदास नामक वैष्णव ने दामोदरदास के इस भाव की बड़ीं प्रशंसा सुनी अत : उसने दमोदरसाद की परीक्षा लेनी चाही | एक दिन ईश्वरदास गाँव के बाहर बावड़ी पर आकर सो गए | दामोदरदास प्रतिदिन बावड़ी तक वैषण्वों की सुधि लेने आया करता था | उसने देखा कोई वैष्ण्व सो रहा है | गले में कण्ठी और माथे पर तिलक विधमान हैं दामोदरदास इ विनती पूर्वक उन्हें जगाया और आदरपूर्वक साग्रह हाथ पकड़ क्र घर ली आए | उनसे महाप्रसाद लेने की विनती की | ईश्वरदास ने कहा - " हम तुम्हारे घर महाप्रसाद नहीं लेंगे |" दामोदरदास ने हाथ जोड़ कर प्रार्थना की - " महाराज आप महाप्रसाद कयों नहीं ले रहे हो ?" ईश्वरदास ने कहा - तुम्हार घर , समस्त गहन, दोनों स्त्रियां, सब हमको देओगे तो लेने का विचार कर सकते हैं |" दामोदरदास ने कहा - " महाराज आपने जो कहा, सो दे दिया | अब आप महाप्रसाद ले लो |" ईश्वरदास ने कहा " " हम अब भी महाप्रसाद नहीं लेंगे |" उसने पूछा - " क्यों ?" ईश्वरदास ने कहा - " तुम घर में से अभी निकल जाओ |" दामोदरदास ने अपने श्रीठाकुरजी की झाँपि लगाईं तो श्रीठाकुरजी बोले - वैषणव प्रसाद लेवे या नहीं लेवे इसकी मर्जी, तू मुझे क्यों पधराता है ?" दामोदरदास बोला - " महाराज, इतने दिन हो गए, तुम आज तक नहीं बोले | आज जब वैष्णव रूष्ट हुए हैं तो बोले हैं | यदि वैष्णव कृपा क्र देंगे तो क्या होंगे ?" जिनका कुपित होना इतना फल दायक है, उनकी प्रसन्नता कितनी अदभूत होगी |" अत : मैं तो वैष्णव को प्रसन्न करने के लिए घर छोड़कर जाउँगी | तभी ये प्रसन्न होकर प्रसाद लेंगे | करा चित भी तभी प्रसन्न होगा | " श्रीठाकुरजी दामोदरदास पर प्रसन्न हो गए और बोले - " ये वैष्णव तेरे पर प्रसन्न है, और हम भी तुझ पर बहुत प्रसन्न है , तुम कुछ भी वरदान माँग लो |" दामोदरदास ने कहा - " महाराज, मुझ पर वैष्णव सदा प्रसन्न रहें वैषण्वों के लिए मेरे मन में कभी अभाव नहीं आवे | श्रीठाकुरजी ने आसा की " ऐसा ही होगा |" जब ईश्वरदास ने दामोदरदास के साथ बैठकर महाप्रसाद लिया और कहा - " मेरा अपराध समा कर दो | मैं तो तुम्हारी परीक्षा लेने आया था " दामोदरदास बहुत हर्षित हुए | ये दामोदरदास श्रीगुसांईजी के ऐसे कृपा पात्र थे जिनके मन में वैषण्वों के प्रति कभी अभाव नहीं आता था | उनके वैष्णव भक्ति के बल से ही श्रीठाकुरजी बोलते थे | ऐसे कृपा पात्र भगवदीय की प्रशंसा कहां तक लिखी जावे |
                                                                    | जय श्री कृष्ण|
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