Wednesday, April 19, 2017

Shri Gusaiji Ke Sevak Ek Gujarati Vaishnav Ki Varta


२५२ वैष्णवो की वार्ता 
(वैष्णव - २१६ श्रीगुसांईजी के सेवक गुजराती वैष्णव की वार्ता


एक समय श्रीगुसांईजी गुजरात पधारे| वहां कुछ वैष्णव सेवक हुए थे| वे सेवा पधराकर पुष्टिमार्गीय प्रणाली से सेवा करने लगे| उनमें से श्रीगुसांईजी के सेवक गुजराती वैष्णव के यहाँ अन्य वैष्णव जन आने लगे| एक बार शीतकाल में उस वैष्णव के घर बहुत वैष्णव आए| उन सबको ओढ़ने और बिछाने के लिए बिस्तर (उपकरण) दिए गए| स्वयं सारी रात लँगोट मार कर बैठा रहा| उसे ठण्ड के कारन नींद नहीं आई| वह भगवन्नाम का स्मरण करता रहा| मन्दिर से बाहर आकर श्रीठाकुरजी ने उससे कहा - " तुझको ठंड सता रही है| तुझे निंद्रा नहीं आ रही है| तेरे कष्ट के कारन हमें भी नींद नहीं आती है| हम भी काँपते हैं| श्रीगुसांईजी ने व्रतचर्या में कहा है -

"सखि निर्भरानुरागात् प्राप्तोडयं निखि ल गोपिकैकात्म्यम् । 
तदयं तच्छितोक्त्या सकंपपुलक: स्वयं चासीत् ॥ "

तब उस वैषणव ने हाथ जोड़ कर कहा - "ये आपके दास मेरे घर पर पधारे हैं यदि इनको ठण्ड लगती तो भी तुमको नींद नहीं आती| अब आपको जागने का और श्रम का अपराध मेरे माथे पड़ा है सो मैं भुगत लूंगा| यदि इन वैष्णवों को ठण्ड लगती तो आपके जागने का दोष इन वैष्णवों को लगता| अब वैष्णवों के बदले मुझे जो भी दोष लगेगा या कष्ट होगा, मैं सहनकर लूँगा| मुझे इसकी कोई चिन्ता नहीं है| यह सुनकर श्रीठाकुरजी हँसे और आज्ञा की - "वैष्णवों का नाम लेने से अपराध नष्ट होते हैं तो तुझे दोष क्यों लगेगा| वैष्णवों की सेवा करने वाले को अपराध कैसे स्पर्श करेगा?" मैं तुझपर बहुत प्रसन्न हूँ| तू वरदान माँग ले|" उस वैष्णव ने वरदान मांगा - "प्रभो, मेरे मन मैं वैष्णवों के प्रति स्नेह दिनों दिन बढ़ता रहे, इन वैष्णवों के स्नेह का ही फल है की आप मुझ से बोल लेते हैं|" श्रीठाकुरजी ने आज्ञा की - "तथाडस्तु - ऐसा ही होगा|" यह सुनकर वैष्णव बहुत प्रसन्न हुआ| उसने प्रसन्न मन से स्नान किया और उत्तम सामग्री बनाकर भोग धरीं| उन समस्त वैष्णवों को महाप्रसाद लिवाया| उस दिन से श्रीठाकुरजी प्रतिदिन उस वैष्णव से बातें करते थे| श्रीठाकुरजी अपनी इच्छित वस्तु माँग लेते थे| वह गुजराती वैष्णव श्रीगुसांईजी का ऐसा कृपा पात्र था जिसके मन में वैष्ण्वों के प्रति अगाध प्रेम और श्रद्धा थी|


                                                                    | जय श्री कृष्ण|
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