Monday, April 17, 2017

Shri Gusaiji Ke Sevak Ek Shravak Ki Beti Ki Varta


२५२ वैष्णवो की वार्ता 
(वैष्णव - १४९ श्रीगुसांईजी के सेवक एक श्रावक की बेटी की वार्ता

श्रीगुसांईजी आगरे पधारे थे| वे आगरा में रूप चाँद नंद के घर विराज रहे थे| उसी समय की बात है, किसी विशेष अपराध में एक व्यक्ति को फाँसी की सजा दी गयी थी| उस फाँसी की सजा को दस - पन्द्रह महिलाओं ने भी देखा| उनमें एक श्रावक की बेटी बड़ी दयावती थी| उस मनुष्य की फाँसी की सजा को देखकर गिर पड़ी और उसे मुर्च्छा आ गई| इस बात की जानकारी श्रीगुसांईजी को भी लगी| उन्होंने मन में विचार किया की यह कोई दैवी जीव है| दैवी जीव के बिना अन्य किसी की ऐसी अवस्था नहीं हो सकती है| उसको अचेत जानकार श्रीगुसांईजी ने एक ब्रजवासी से कहा - "इसके ऊपर जल के छींटे लगाऒ|" उस ब्रजवासी ने ऐसा ही किया| दो घड़ी के बाद उसकी मूर्च्छा खुली| उस समय उस श्रावक की बेटी ने उस ब्रजवासी से पूछा - "तू कौन है?" उस ब्रजवासी ने कहा - "मैं तो श्रीगुसांईजी का सेवक हूँ|" उससे श्रीगुसांईजी का यश सुनकर श्रावक की बेटी उनके दर्शन करने के लिए आई| उस ब्रजवासी ने श्रीगुसांईजी से निवेदन किया की यह मूर्च्छित होने वाली महिला है| श्रीगुसांईजी ने आज्ञा की - "यह शुद्ध भाववाली है, इसके ऊपर जितना रंग चढ़ाओगे, उतना रंग चढ़ेगा|" वह श्रावक की बेटी बोली - "आप जैसा कारीगर रंग चढाने वाला कहाँ मिलेगा?" यह सुनकर श्रीगुसांईजी बहुत प्रसन्न हुए| श्रीगुसांईजी ने उसे नाम सुनाए और निवेदन कराए| वह श्रावक की बेटी अपने घर में आकर धोने और लीपने लगी| उसके पति ने उससे पूछा - "तू यह क्या करने लग गयी है?" तब उसने कहा - "मैं तो श्रीगुसांईजी की सेवक हो गयी हूँ|" उसके पति ने कहा - "मैं भी श्रीगुसांईजी का सेवक हो कर आता हूँ|" इस प्रकार उसका पति भी श्रीगुसांईजी का सेवक हो गया| दोनों स्त्री - पुरुष श्रीठाकुरजी को पधरा कर सेवा करने लगे। प्रतिदिन श्रीगुसांईजी के दर्शन करने के लिए आते थे| श्रीगुसांईजी आगरे से श्रीगोकुल पधारने लगे तो उस समय श्रावक की बेटी ने श्रीगुसांईजी से निवेदन किया - "आपके दर्शनों के बिना मैं नही रह सकती हूँ|" श्रीगुसांईजी ने आज्ञा की - "तू प्रतिदिन यमुना जल भरने के लिए आना| जब तू यमुनाजी में स्नान करेगी तो हम तुजे दर्शन देंगे|" श्रीगुसांईजी के श्रीगोकुल पधारने पर श्रावक की बेटी निर्देशानुसार यमुनास्नान करने लगी| फिर कुछ दिन बाद कुछ ब्रजवासी श्रीगोकुल से आगरा आए, वे उसके घर में उतरे थे| उनमें से एक ब्रजवासी ने उस श्रावक की बेटी से कहा - "मैं श्रीगोकुल में श्रीगुसांईजी की बैठक मैं गौमुखी भूल आया हु अत: श्रीगोकुल के लिए वापस जा रहा हूँ| तभी प्रसाद ग्रहण करूँगा|" उस श्रावक की बेटी ने कहा - "रुको - रुको, मैं श्रीगुसांईजी के दर्शन करने जाउंगी तो मैं तुम्हारी गौमुखी भी ले आउंगी|" इतना कहकर वह की बेटी जल भरने के लिए यमुना पर गयी और जब स्नान करके दर्शन किए तो उस ब्रजवासी की गौमुखी भी मिल गयी|" गौमुखी लेकर आई और उस ब्रजवासी को दी, ब्रजवासी बड़े विचार में पद गया की इतनी जल्दी यह श्रीगोकुल जाकर इस गौमुखी को कैसे ले आई| वह ब्रजवासी उस श्रावक की बेटी के पावों पर गिर पड़ा| उसने कहा - "इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है, यह सब तो श्रीगुसांईजी का प्रताप है| जब श्रीगुसांईजी अलौकिक देह का दान करते हैं, तो सब कार्य सिद्ध होते है| यह सुनकर ब्रजवासी चुप रह गया| वह श्रावक की बेटी ऐसी कृपा पात्र हुई जिसको अलौकिक पदार्थ सर्वत्र सर्व में व्यापक दीखते थे|


                                                                    | जय श्री कृष्ण|
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