Monday, July 11, 2016

Shri Gusaiji Ke Sevak Shyamdas Virkt Ki Varta

२५२ वैष्णवो की वार्ता
(वैष्णव-१५९)श्रीगुसांईजी के सेवक श्यामदास विरक्त की वार्ता

विरक्त श्यामदास के ऊपर श्रीगुसांईजी की पूर्ण कृपा थी| उनको श्रीठाकुरजी अनुभव जानते थे| एक दिन लालदास ब्राह्मण श्रीगुसांईजी का सेवक बना और उसने विनती की - "महाराज,में कैसे करुँ? मेरा चित्त स्थिर नहीं रहता है|" श्रीगुसांईजी ने कहा - "तुम एक वर्ष तक श्यामदास का सत्संग करो|" श्रीगुसांईजी की आज्ञा की अनुपालना करते हुए लालदास ने श्यामदास से कहा -"में एक वर्ष तक तुम्हारा सत्संग करूंगा| मुझे एतदर्थ श्रीगुसांईजी ने आज्ञा दी है|" श्यामदास ने कहा- " मुझे तो पर देश जाना है|" लालदास ने कहा -"में भी आपके साथ ही चलूँगा, आपकी टहल करूँगा|" श्यामदास परदेश के लिए रवाना हुए| लालदास भी उनके साथ ही चल दिया| रास्ते में एक गाँव में एक वैष्णव के घर मण्डान था अत: उस दिन पाँच सो मनुष्यो को भोजन कराने का निष्चय किया गया था| उन्होंने श्यामदास और लालदास को भी निमंत्रण दिया| दोनों जब भोजन करने बैठे तो श्यामदास को पतल पर सब कीड़ा जैसे दिखाई दिए| श्रीठाकुरजी ने श्यामदास को ऐसा अनुभव कराया की यह द्रव्य कन्या - विक्रय का है| अत: मैंने न तो आरोगा है और नाही अंगीकार किया है| तुम यह प्रसाद मत लेना| अत: श्यामदास को बहुत समझाया, लेकिन उसने प्रसाद लेने के लिए मनाकर दिया| लोगो ने श्यामदास को बहुत समझाया, लेकिन उसने प्रसाद नहीं लिया| वह तो वहां से उठकर दूसरे गाँव में चला गया| लालदास वही बैठा रहा और सोचता रहा- "श्यामदास कैसा वैष्णव है? जो वैष्णव का कहना नहीं मानता है| लालदास ने प्रसाद ग्रहण किया और प्रसाद ग्रहण करके श्यामदास के पास गए| उस दिन से श्यामदास ने लालदास से बोलना बन्ध कर दिया| केवल उसके लिए पत्तल घर देते थे, प्रसाद करा देते थे| इस प्रकार एक वर्ष व्यतीत हो गया| जब श्रीगोकुल लौटकर आए तो लालदास ने श्रीगुसांईजी से विनती की -"श्यामदास तो कुछ भी नहीं समझता है, इसने पाँच सौ वैष्णवो की आज्ञा का तिरस्कार किया है| हमने तुमसे श्यामदास के अनुकूल आचरण का आदेश दिया था तो तुमने वहाँ भोजन क्यों किया? वह द्रव्य तो कन्या विक्रम का था| श्रीठाकुरजी ने नहीं आरोगा था| अत: अब तुम दो वर्ष तक पुन: श्यामदास की टहल करो| श्रीगुसांईजी की आज्ञा पाकर लालदास पुन: श्यामदास की टहल karne लगे| श्यामदास श्रीगुसांईजी के ऐसे कृपा पात्र थे जिनको श्रीठाकुरजी ने जताया था की कन्या विक्रय के द्रव्य से किया जाने वाला सत्कर्म भी व्यर्थ होता है|
|जय श्री कृष्णा|



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