Thursday, July 9, 2015

Shri Gusaiji Ke Surat Nivasi Sevak Ki Varta

२५२ वैष्णवों की वार्ता
(वैष्णव ४७)श्रीगुसांईजी के सूरत निवासी सेवक की वार्ता

वह वैष्णव प्रति वर्ष ब्रजयात्रा करने के लिए जाया करता था| श्रीनाथजी के दर्शन करके और व्रजयात्रा पूर्ण करके वापस आता था| वह वैष्णव व्रज की हाँडी रखता था| नित्य प्रति रसोई करके धोकर कम्बल में बाँधकर वृक्ष में लटका देता था| एक दिन वैष्णवों ने श्रीगुसांईजी से कहा-" यह वैष्णव अनाचार फैलाता है|" श्रीगुसांईजी ने उस वैष्णव से पूछा| उसने कहा- " ये सब वैष्णव बाह्य दॄष्टि के है|" व्रज के स्वरूप को नहीं जानते है| फिर भी आपकी कृपा से इनको व्रज का स्वरूप दिखाता हूँ|" इतना कहकर उस वैष्णव ने सभी को व्रज का स्वरूप दिखाया| सभी वैष्णवों को समस्त व्रज स्वर्णमय दिखाई देने लगा| सभी वैष्णवों को श्रीगुसांईजी ने कहा-" इसने व्रज रज के स्वरूप को जान लिया है अतः इसको कुछ भी बाधा नहीं है| सामथ्यवान् कुछ भी कर सकता है| लेकिन अन्य वैष्णव ऐसा करने से बचें| सभी वैष्णव उसको धन्य धन्य कहने लगे| वह श्रीगुसांईजी का ऐसा कृपा पात्र था जिसने व्रज को स्वर्णमय दिखा दिया| वह व्रज रज की बनी हाँडी को स्वर्णमय समझकर कभी हटाते नहीं थे| प्रतिदिन धोकर रख देते थे| वह सेवक ऐसा परम भगवदीय था|


।जय श्री कृष्ण।

 
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