Monday, May 22, 2017

Shri Gusaiji Ke Sevak Ek Balaii Ki Vaarta


२५२ वैष्णवो की वार्ता 
(वैष्णव - १६८ श्रीगुसांईजी के सेवक एक बलाई की वार्ता
एक समय श्रीगुसांईजी गुजरात से ब्रज को पधार रहे थे| वे मार्ग भूल गए| वहाँ एक बलाई मिला| उससे वैष्णव ने मार्ग पूछा| उस बलाई ने कहा - "इसमार्ग में तो आपको लुटेरे(वटमार) मिल सकते हैं| अत: आपको एक अन्य मार्ग बतलाता हूँ|" वह बलाई उनको एक अच्छे मार्ग पर लेकर आ गया| वैष्णवों ने बलाई से पूछा - "तुम्हारा कौन सा गाँव है?" बलाई ने कहा - "जिस मार्ग से तुम लोग जा रहे हो, वहीँ आगे केरा गाँव पड़ेगा|" उन वैष्णवों ने कहा - "तुम हमारे साथ चलो तो तुम्हें खाने को देंगे तथा हाथ खर्ची भी देंगे|" यह सुनकर वह बलाई उनके साथ चल दिया| रास्ते में डेरा किया| वहाँ रसोई बनाई और श्रीठाकुरजी को भोग धरा| श्रीगुसांईजी ने भोजन किया और तत्प्श्चात् समस्त वैष्णवों ने प्रसाद लिया| उस बलाई को जूँठन दी| जूँठन को खाते ही उस बलाई के समस्त पाप क्षय हो गए| उसका अन्त:करण निर्मल हो गया| उसे श्रीगुसांईजी के दर्शन साक्षात् पूर्ण परमात्मा के रूप में हुए| उसने श्रीगुसांईजी से शरण में लेने की प्रार्थना की| श्रीगुसांईजी ने कृपा कर के उसे नाम सुनाया| उसका मन इतना पवित्र हो गया की वह श्रीगुसांईजी के संग चल दिया| प्रतिदिन वैष्णवों की जूँठन लेता था| उसका वैष्णवों के प्रति दिनों दिन अनुराग बढ़ता गया| धीरे - धीरे उसका गाँव आ गया| उसके गाँव में श्रीगुसांईजी ने डेरा किया| उसने स्त्री को भी श्रीगुसांईजी का सेवक किया| उसने अपनी स्त्री को भी वैष्णवों की जूँठन खिलवाई| वैष्णवों की जूँठन खाने से उसके मन का मैल धुल गया| चित्त निर्मल हो गया| वह दर्शन करके अपने घर चली गई| उसको घर जाते समय मार्ग में ही विरहताप हुआ और वह मूर्च्छित हो गई| बलाई उसे उठाकर पून: श्रीगुसांईजी के सामने ले आया| श्रीगुसांईजी के साथ ही व्रज के लिए चल दिए| वे श्रीगोकुल में आ गए| वे किसी को स्पर्श नहीं करते थे| दूर दूर चलते थे| श्रीयमुनाजी के घाट पर श्रीगुसांईजी पधारे| वे दोनों स्त्री पुरुष वहाँ ही बैठे रहे| उन्हें लोगों ने नाव में बैठने को कहा, लेकिन छू जाने के भय से नाव में नहीं बैठे| वे श्रीयमुनाजी के इसी पार पर रह गए| पर नहीं उतरे| दूसरे दिन उनको श्रीगुसांईजी के दर्शन नहीं हुए| उनको ज्वर चढ़ गया| वे मूर्च्छा खाकर वहीँ पर पड़े रहे| यह समाचार श्रीगुसांईजी को प्राप्त हुआ| श्रीगुसांईजी ने अपने लोगों को भेजा| उनको मूर्च्छित अवस्था में ही नाव में डालकर पार उतार दिया| उनकी मूर्च्छा नहीं खुली तो श्रीगुसांईजी स्वयं पधारे ओर उन दोनों को चरणस्पर्श कराये, तब उनकी मूर्च्छा खुली| उन्होंने श्रीगुसांईजी से प्रार्थना की - "आपके दर्शनों के बिना हमारे प्राण नहीं रहेंगे|" श्रीगुसांईजी ने पादुका की सेवा उनके माथे पधरा दी और कहा कि - "तुम इन पादुकाओं की सेवा करो| जब भी तुम्हारा दर्शन करने का मनोरथ होगा, तो इन पादुकाओं में से रूप धारण करके तुम्हें दर्शन दूँगा|" इनको फल - फूल, मेवा व दूध की सामग्री का भोग धरना| एकान्त में जाकर सेवा करना| वे दोनों स्त्री पुरुष एक निर्जन वन में एक गुफा में जाकर रहे| वहाँ पादुका पधराकर सेवा करने लगे| प्रतिदिन फल - फूल लाकर भोग लगाते थे| उन दोनों को सायं - प्रात: दोनों समय श्रीगुसांईजी के दर्शन होते थे| कभी तो श्रीगुसांईजी पुस्तक बाँचते दर्शन देते थे| कभी श्रीगुसांईजी उन्हें जप करते हुए दर्शन देते थे| कभी संध्या वन्दन करते हुए दर्शन देते थे| जैसे उनके मनोरथ होते वैसे ही उन्हें दर्शन देते थे| उसकी स्त्री ने बलाई से कहा - "मेरे इस मनका को बेचकर मुझे चरखा और पूणी लाकर दे दो|" बलाई ने वैसा ही किया| बलाई की स्त्री ने चरखा कात कर सूत बेचकर पाँच - सात रूपया इकठ्ठे करके एक गाय ख़रीद ली| उन्होंने गाय के कान में अष्टाक्षर मंत्र का उच्चारण कर दिया| गाय निर्भय होकर जंगल में चरने लगी| गाय के दूध की सामग्री का भोग लगाने लग गए| वह गाय जंगल के जीवों और मनुष्यों को सिंह जैसी दिखाई देती थी| अत: वह निर्भय होकर चरती थी| वह कामधेनु के समान दूध देती थी| उधर कोई आ निकलता था तो उस कन्दरा में रहते हुए दोनों स्त्री पुरुष उसकी सेवा करते थे| एक दिन चार ब्राह्मण मार्ग भूलकर उस निर्जन वन में बिलाई की कन्दरा के पास आ निकले| उन दोनों स्त्री पुरुष ने उनका बहुत सत्कार किया| उन दोनों ने उन ब्राह्मणों से वन में भटकने का कारण पूछा| ब्राह्मणों ने कहा - " हमारे गाँव के राजा ने सब ब्राह्मणों को कैद कर लिया है| उसने कहा है - ब्राह्मणों तुमने दान धर्म के नाम पर मेरे पिता से लाखों रुपये खाये हैं| अब मेरे पिता के हाथ का पत्र लाकर दो की वह स्वर्ग में गए है| अन्यथा सारा दान में लिया हुआ धन वापस करो| हम लोग राजा से बचाकर डरते हुए इस वन में आ गए हैं|" उस बलाई की स्त्री ने कहा - "राजा का पिता तो नरक में पड़ा है| मैं यहाँ से ही देख रही हूँ| तुम कहो तो तुमको मिला दूँ|" तब ब्राह्मणों ने हाथ जोड़कर कहा - " जैसे बने वैसे हमें एक बार मिला दो तो बड़ी कृपा हो।" बलाई की स्त्री ने कहा - "तुम लोग आँख मींच लो|" वे चारों ब्राह्मण आँख बन्द करके बैठ गए| उस स्त्री ने भगवत् कृपा से उनको यमलोग में पहुँचा दिया| वे चारों ब्राह्मण यमराज से कहकर राजा के पिता से मिले और सब समाचार कहकर उससे पत्र लिखा लिया| "उसमें लिखा था कि तुमने जब से इन ब्राह्मणों को कैद में डाला है, तभी से मैं नरक में पड़ा हुआ हूँ| यदि तुजे द्रव्य की आवश्यकता है तो अमुक कोठे में अटूट धन विद्यमान हैं| उसमें गुप्त खजाना है| उसमें तू अपने हाथ से जितना धन चाहता है, निकाल लेना| यदि कोई दूसरा हाथ डालेगा तो उसे कुछ भी नहीं मिलेगा|" इस प्रकार पत्र लिखाकर ब्राह्मणों ने बलाई की स्त्री का ध्यान करके आँखे खोलीं वे चारों उस निर्जन वन की कंदरा में अवस्थित मिले| उस चारों ने उस बलाई की स्त्री से कहा - "तुमने हमें जीवन दान किया है|" उस बलाई ने कहा - "यह सब प्रताप तो श्रीविठ्ठलनाथजी श्रीगुसांईजी का है| वे नंदकुमार हैं जो श्रीगोकुल में विराजें हैं|" वे चारों ब्राह्मण श्रीगोकुल में जाकर श्रीगुसांईजी के सेवक हुए| बाद में उस राजा के पत्र को लेकर तत्कालीन राजा के पास गए| वह बलाई और उसकी स्त्री श्रीगुसांईजी के ऐसे कृपा पात्र थे|


                                                                    | जय श्री कृष्ण|
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