Saturday, April 22, 2017

Shri Gusaiji ke Sevak Do Vaishnav (Jinhonne Eent Par Akshar kie) Kee Vaarta


२५२ वैष्णवो की वार्ता 
(वैष्णव - २०० श्रीगुसांईजी के सेवक दो वैष्णव (जिन्होंने ईंट पर अक्षर किए) की वार्ता


इन दोनों वैष्णवों में से दोनों भिन्न भिन्न गाँवों में रहते थे| इनमें से एक का नाम वल्लभदास था और दुसरे का नाम बलदेव दास था| ये दोनों एक दूसरे से एक रास्ते में एक बावड़ी पर मिलते थे| आपस में भगवद् वार्ता करते थे| बलदेवदास ने पूछा - "श्रीठाकुरजी मोर पंख का मुकुट धारण करते हैं, इसका क्या कारण है| वे अन्य किसी पक्षी की पंख क्यों नहीं धारण करते हैं? अनेक पक्षियों की सुन्दर पंखें हैं|" यह सुनकर वल्लभदास बोले - "श्रीठाकुरजी का स्वरुप आनंद रूप है, वह विषयी जीवों को दुर्लभ है, श्रीठाकुरजी विषय रहित जीवों के वश में हैं| जैसे - मयूर पक्षी, विषय रहित है, वह दृष्टि के द्वारा रसदान करता है| श्रीठाकुरजी अपने दास के लिए ऐसी सूचना देते हैं कि मयूर विषय रहित है और दृष्टि द्वारा रसदान करता है| वह जब नृत्य करता है तो अपने शरीर को देखता है, सारे शरीर को देखकर बहुत प्रसन्न होता और जब अपने पैरों को देखता है तो उसे वे पैर काले - काले दिखाई देते हैं, उन्हें देखकर वह रुदन करने लग जाता है| सोचता है, मुझ में इतना दोष नहीं होता तो बहुत अच्छा रहता| उस समय मयूर के नेत्रों में से जल पड़ता है, उस समय मयूरियाँ उस जल को अपने मुख में लेकर आनंदित होती हैं| उस जल के ग्रहण करने से वे काम निवृत हो जाती हैं| दृष्टि द्वारा ही मयूरियों के मनोरथ सफल हो जाते हैं| उन्हें गर्भ स्थिति हो जाती है| ऐसे मोर श्रीठाकुरजी को बहुत प्रिय हैं| जैसे मोर दृष्टी से मयूरियों को काम निवृत करता है, वैसे ही श्रीठाकुरजी भी दृष्टी के द्वारा ही सब जीवों को काम निवृत कर देते है, वे सोचते हैं - निर्विषयी जीव हम को बहुत प्रिय हैं| अत: मोर पंख मस्तक पर धारण करते हैं|" पुनः बलदेव दास ने पूछा - "श्रीठाकुरजी काछनी क्यों धारण करते हैं?" तब वल्लभदासजी ने कहा - "काछनी का घेर बहुत होता है| घेर बहुत इकठ्ठा किया जाता है| ऐसे ही अनेक भक्तों को इकठ्ठा करके एक कालावच्छिन्न सबके मनोरथ दृष्टी द्वारा ही पूर्ण कर देते हैं| जैसे मोर एक स्त्री का मनोरथ पूर्ण करता है, उसी प्रकार व्रजभक्तों के मनोरथ पूर्ण होते हैं| यह सूचना देने के लिए श्रीठाकुरजी मुकुट और काछनी का श्रृंगार धारण करते हैं| इस व्याख्यान से बलदेव दास बहुत प्रसन्न हुए| तब एक ईंट पर लिख गए - " हम दो घड़ी जीवें"। उस ईंट को भींत (दीवाल) में लगा दिया| वह ईंट वहाँ भीत में लगी थी| वहाँ एक राजा घूमता फिरता आ निकला| उसने ईंट पर खुदे हुए अक्षरों को देखा| उस राजा को संदेह हुआ| राजा ने विचार किया, लिखने वाले ने लिखा है - "हम दो घड़ी जीवें|" यह लिखने वाला कब जन्मा होगा? पढ़ा कब होगा? और यहाँ बावड़ी पर आया कब होगा| उसने कितनी देर में लिखा होगा| उसने दो घड़ी में इतने सारे काम कैसे कर दिए होंगें| राजा को बहुत संदेह हुआ| राजा उस ईंट को अपने घर ले गए| जो भी आता, उससे पूछते - "इस लिखने वाले ने दो घड़ी में इतने सरे काम कैसे किये होंगे?" राजा को बहुत संदेह था| निदान कोई नहीँ बता रहा था| इतने में भगवदिच्छा से एक वैष्णव आया, उस राजा ने वही प्रश्न पूछा, तो वैष्णव ने कहा - "दो वैष्णव मार्ग में मिले होंगे| आपस में भगवद् वार्ता की होगी| उन्होंने चलते समय इसे लिखा होगा| तब राजा का संदेह मिटा| वह राजा भी वैष्णव के संग से वैष्णव हो गया| दोनों ही वैष्णव श्रीगुसांईजीk ऐसे कृपा पात्र थे जिनके अक्षरों से ही राजा वैष्णव हुआ|


                                                                    | जय श्री कृष्ण|
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