Wednesday, April 12, 2017

Shri Gusaiji Ke Sevak Ek kshatri Ki Varta

२५२ वैष्णवो की वार्ता 
(वैष्णव - ५९श्रीगुसांईजी के सेवक एक क्षत्री की वार्ता  


वह क्षत्री हीरा की धरती का शोधक था| एक समय ऐसा आया वर्षा न होने के कारण उसकी खेती में कुछ भी पैदा नहीं हुआ| सरकार ने लगान के पैसे माँगे| उसके पास कुछ भी नही था| वह लगान के पास कैसे देता ? सरकार ने उसका घर लूट लिया| उसके घर में कुछ भी नही रहा| उसकी पत्नी चरखा कातकर जो भी कमाती थी, उससे घर का खर्च चलता था| लेकिन दोनों ही प्राणियों को कष्ट होता था की श्रीठाकुरजी को श्रम होता है| यह सोचकर वह परदेश जाने का विचार करने लगा| उसने सोचा हीरों की भूमि में चलकर कुछ कामना चाहिए| वह उस देश में गया जहाँ भूमि से हीरा निकलते थे| एक व्यापारी से सौदा हुआ, "मैं भूमि परख कर हीरा बताऊंगा, जो माल निकले, उसमे से आधा देना होगा| व्यापारी राजी हो गया| क्षत्री के द्वारा बताई भूमि में माल तो बहुत मिला लेकिन व्यापारी बेईमान निकाला, इसे कुछ भी नही दिया| इसने अन्य एक व्यापारी से इसी प्रकार पुनः सौदा तय किया| उसकी भूमि में हीरों का माल बहुत मिला| उससे आधा माल बॉटकर अपने देश चलने का विचार किया| इसी बीच उस पहिले व्यापारी के घर में आग से माल स्वाहा(अग्नि दाह) हो गया| उसका सारा माल जल गया| वह व्यापारी आकर उस क्षत्री के चरणों में लेट गया| वैष्णव को सहज ही दया आ गई| उसके क्षमा याचना करने पर उस क्षत्री ने उसको पुनः भूमि का शोधन कर हीरों की भूमि बताई| वैष्णव का धर्म ही यह है की जो बुरा करे उसके साथ भी भला की करे| वह क्षत्री वैष्णव दो चार नौकर साथ में लेकर अपने देश को चल दिया| रास्ते जंगल में एक तालाब था| उस तालाब पर ग्यारह ठग ठहरे हुए थे| क्षत्री वैष्णव ने भी वहाँ ही डेरा कर दिया| उसने अपने मनुष्यों से कहा - "तुम चार जने गाँव में से सामग्री ले आओ|" वे चारों तो गाँव में चले गए| क्षत्री वैष्णव अकेला था अत: उन ठगों ने सोचा - "इसे मार इसका सारा धन ले लेना चाहिए|" उन ठगों का यह विचार आते ही क्षत्री वैष्णव ने उनकी चेष्टा को पहचान लिया और वह तालाब में स्नान करने लग गया| उसने स्नान करने के बाद श्रीगुसांईजी का ध्यान किया| श्रीगुंसाईजी तो करुणालय है, भक्त प्रणतपाल है अत: उन्होंने उसको वही दर्शन दिया| क्षत्री वैष्णव ने विनती की - "प्रभो, मेरा क्या अपराध है? ये ठग मुझे मारना चाहते है? " श्रीगुसांईजी ने कहा - "ये ग्यारह ठग पिछले जन्म में भी चोर थे और तुन सरकार की नौकरी में थे, तुमने इनको मारा था अत: ये जब अपना वैर का प्रतिशोधन करेंगे| तुम्हे ग्यारह बार नहीं मरना पडेगा, ये एक बार ही अपना वैर का प्रतिशोधन कर लेंगे|" श्रीगुंसाईजी की आज्ञा लेकर वह क्षत्री ठगों से बोला - "लो भाई, अब तुम सब मिलकर मुझको मार दो|" इन ठगों ने श्रीगुंसाईजी की वाणी तो सुनी थी, इन्हें दर्शन नहीं हुए, केवन वाणी सुनने मात्र से ही इनकी बुद्धि निर्मल हो गई| जैसे भगवान् के पार्षर्दो की वाणी सुनकर अजामिल की बुद्धि निर्मल हो गई| जब यमदूत अजामिल को मारने लगे तो भगवत पार्षर्दो ने उसे छुड़ाया और भगवत पार्षर्दो ने यमदुतो को भगवद यश सुनाया था| वह यश अजामिल ने भी सुना था| इसे अजामिल के लिए "अमृत बिन्दु" कहा गया है| श्रीमहाप्रभुजी ने जलभेद में लिखा है - "तादृशानां क्वचिद वाक्यं दूतानामिव वर्णितम । अजामिलकर्णव बिन्दुपान प्रकीतिर्तम||" (भगवान् के पार्षर्दो ने यमदूतों को जो भगवद यश सुनाया उसे अजामिल ने 'अमृत बिन्दु' के समान सुनकर ग्रहण किया, इसे अमृत-बिन्दु जन कहा गया है|) इस प्रकार उन ठगों को अमृत - बूंदो का पान हुआ| उन्होंने पूछा - "तुमने तालाब में किससे बातें की थी? तुमसे हमारे पूर्व जन्म का वृतान्त किसने कहा? अब तो हम तुम्हारे दास होंगे, हम तुम्हें नहीं मारेंगे| हमे तुम्हारा धन भी नही चाहिए| हमे तो तुम सत्य बताओं, तुमने किससे बातें की थी?" उस क्षत्री वैष्णव ने सारी बात उन ठगों को बता दी| वे सब ठग उस क्षत्री वैष्णव के पाँव पर गिर पड़े| उन्होंने कहा - "हमें भी श्रीगुंसाईजी का सेवक कराओं| इस क्रम में क्षत्री वैष्णव ने उन्हें स्वीकृति दी| तत्पश्चात रसोई करके सबको प्रसाद लिवाया और अपने गाँव आ गया| यहाँ आकर उन हीरों में से अच्छे अच्छे हीरों से श्रीगुंसाईजी का हार बनवाया और शेष हिरा दस हजार रूपये में बेचकर घर खर्च की व्यवस्था की| इसने अपने श्रीठाकुरजी को पधरा कर ; अपनी स्त्री को साथ लेकर तथा उन ठगों को संग में लिवाकर श्रीगोकुल आ गया| श्रीगुंसाईजी के दर्शन किए उनसे उन ठगों की बात कही| श्रीगुंसाईजी की आज्ञा से वे ठग श्रीगुंसाईजी की शरण में गए| श्रीगुंसाईजी की कृपा से उन ठगों को श्रीमहाप्रभुजी श्रीगिरिराजजी, श्रीयमुनाजी और ब्रजभूमि के स्वरुप का यथार्थ ज्ञान हुआ| वह क्षत्री वैष्णव इस कृपा पात्र भगवदीय था|


                                                                    |जय श्री कृष्णा|
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