Wednesday, July 6, 2016

Shri Gusaiji Ke Sevak Preto Ke Udhaar Ki Varta

२५२ वैष्णवो की वार्ता
(वैष्णव-१५८)श्रीगुसांईजी के सेवक प्रेतों के उध्द्वार की वार्ता

एक बार श्रीगुसांईजी गुजरात पधारे तो एक गाँव के बाहर उन्होंने विश्राम(डेरा) किया| श्रीगुसांईजी उस गाँव में कभी पधारे नहीं थे| सायंकाल हो जाने पर उन्होंने गाँव के बाहर डेरा कर लिया| वहाँ पर दो प्रेत रहते थे| उन दोनों प्रेतों ने सोचा - " इनकी शरण में जाने पर हमारा उद्धार सम्भव है|" अत: प्रेतों ने श्रीगुसांईजी के जलघडिया को अपना रूप दिखाया| जल घड़िया ने श्रीगुसांईजी से कहा -"महाराज, इस कूप में मुझे दो प्रेत दिखाई दे रहे है| इनकी दॄष्टि का जल अपने काम में आ सकता है या नहीं| श्रीगुसांईजी उन्हें देखने के लिए कूप तक पधारे| दोनों प्रेतों ने उन्हें देखकर साष्टांग दण्डवत किया। श्रीगुसांईजी ने इनके ऊपर कृपा दॄष्टि करके इन्हे नाम निवेदन कराया| वे दोनों तत्काल प्रेत योनि से छूटकर भगवल्लीला में लीन हो गए| उस गाँव में वैष्णववजन रहते थे, उन्होंने श्रीगुसांईजी से पूछा - " ये पिछले जन्म में कौन थे?" श्रीगुसांईजी ने आज्ञा की -"ये दोनों पहले जन्म में कान्य कुब्ज ब्राह्मण थे। मर्यादा मार्ग के वैष्णव थे| मर्यादारीति से सेवा करते थे| जब उस ब्राह्मण की देह छूटने लगी तो उसकी स्त्री ने कहा-"अब में कैसे करू?" उस ब्राह्मण ने कहा-"तू अन्न जल त्यागकर देह छोड़ देना|" उस स्त्री ने वैसा ही किया, उसने भगवत सेवा छोड़कर देह त्याग की| उसके पति ने उसे देह त्यागने का रास्ता बताया अत: दोनों प्रेत योनि में रहे| अब इनका उद्धार हुआ है"। इसीलिए वैष्णव को सहज ही भगवत सेवा नहीं छोड़नी चाहिए| किसी को भगवत सेवा छोड़ने की सलाह भी नहीं देनी चाहिए| भगवत सेवा के आगे भी धर्म तुच्छ है। भगवत सेवा से बढकर कोई धर्म नहीं है| श्रीठाकुरजी ने गीता में कहा है- "सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेक शरणं व्रज|" इन वचनो के प्रमाण से भगवत सेवा के आगे सब धर्म तुच्छ है| इस रीती से भजन सेवा आदि श्रेष्ठ है| अन्य सब धर्म तुच्छ है। यह सुनकर सभी वैष्णव बहुत प्रशन्न हुए| वे दोनों प्रेत श्रीगुसांईजी की कृपा से भगवल्लीला में गए|

|जय श्री कृष्णा|
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