Thursday, September 17, 2015

Shri Gusaiji Ke Sevak Ma Beta Ki Varta

२५२ वैष्णवों की वार्ता
(वैष्णव ६१)श्रीगुसांईजी के सेवक माँ बेटा की वार्ता

ये दोनों माँ बेटा तीर्थ यात्रा करने के लिए गए| तीर्थयात्रा करते हुए ये श्रीगोकुल में पहुँचे| वहाँ इन्होने श्रीगुसांईजी के दर्शन पूर्ण पुरषोत्तम के रूप में किए| इन दोनों माता पुत्रो ने श्रीगुसांईजी से प्राथना की -" हमें सेवक बना लो|" श्रीगुसांईजी ने इन पर कृपा करके इन्हे नाम निवेदन कराया| श्रीगुसांईजी से आज्ञा लेकर ये श्रीनाथजी के दर्शन करके श्रीगोकुल पुनः आ गए| वे श्रीगुसांईजी के बिना एक दिन भी नहीं रह सकते थे| उस बेटा की श्रीगुसांईजी में अधिक आसक्ति थी अतः ये बहुत दिनों तक श्रीगोकुल में श्रीगुसांईजी के पास रहे| एक दिन श्रीगुसांईजी ने उन्हें आज्ञा दी-" तुम अपने गाँव को जाओ|" उन्हों ने कहा-" महाराज, आपके दर्शनों के बिना गाँव में कैसे रहा जाएगा?" श्रीगुसांईजी ने उन्हें एक ऐसा भगवत स्वरूप पधारया जिसमे श्रीगुसांईजी स्वयं उस स्वरूप में दर्शन देते थे| उस स्वरूप से ही वे बातें करते थे| वे दोनों उस स्वरूप की श्रृंगार व् भोजन आदि सेवा करते थे| वे दोनों माँ बेटा श्रीगुसांईजी के स्वरूप की सेवा अपने घर में जीवन पर्यन्त करते रहे| उनकी संसार में आसक्ति नहीं हुई| वे जीवन भर उस स्वरूप में आसक्त रहे|  वे घर में गुप्त रूप से सेवा करते थे, उनके सेवा करने को कोई भी नहीं जानता था| वे माँ बेटा ऐसे कृपा पात्र भगवदीय थे|

।जय श्री कृष्ण।


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