Monday, September 28, 2015

Shri Gusaiji Ke Sevak Ek Dokri Ki Varta

२५२ वैष्णवों की वार्ता
(वैष्णव ६३)श्रीगुसांईजी के सेवक एक डोकरी की वार्ता

उस डोकरी के माथे श्रीबालकृष्णजी विराजते थे और वह भक्ति भाव से सेवा करती थी| एक दिन उस डोकरी का काल आया और उसे काल के साक्षात दर्शन हुए| उस डोकरी ने काल से कहा-" मै तो अभी नहीं चलूँगी|" यह सुनकर काल लौट गया| इस प्रकार उस डोकरी ने आठ बार काल को पुनः कर दिया| एक दिन काल ने धर्मराजा से कहा-" मै आठ बार डोकरी के पास से पुनः आया हूँ| मै जब भी जाता हूँ, वह भगवत सेवा में संलग्न मिलती है| मुझे आते हुए देखकर दूर से ही हाथ हिलाकर मना कर देती है| उसके शरीर में ऐसा तेज है कि मै उसके शरीर के समीप नहीं जा सकता हूँ| यमराज ने कहा-" यह भगवद भक्त डोकरी तेरे दण्ड में नहीं आएगी| यह तो काल के माथे पर पाँव रख कर भगवल्लीला में पहुँचेगी| फिर एक दिन श्रीगुसांईजी राज नगर पधारे| उस डोकरी ने श्रीबालकृष्णजी को श्रीगुसांईजी के लिए समर्पित कर दिया| वह देह त्याग कर भगवल्लीला में प्राप्त हो गई| वह डोकरी ऐसी भगवदीय थी जिसने स्वेच्छा से देह त्यागी|

।जय श्री कृष्ण।


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