Monday, July 20, 2015

Shri Gusaiji Ke Sevak Dokri Dhani Puni Vali Ki Varta


२५२ वैष्णवों की वार्ता
(वैष्णव ४९ )श्रीगुसांईजी के सेवक डोकरी धानी पूनी वाली की वार्ता

उस डोकरी ने श्रीगुसांईजी से विनती करके अपने माथे श्रीठाकुरजी पधराये| वह नियम से सेवा करने लगी| वह सूत कात कर निर्वाह करती थी जब वह कातने बैठती तभी श्रीठाकुरजी उस डोकरी के पास की पूनी में विराज जाते| बाल लीला करते और पूनी की गादी-तकिया करके बैठ जाते| एक पूनी उस डोकरी के हाथ में देते और भूख लगती तो धानी माँगते थे| एक दिन उस डोकरी की व्यवस्था श्रीगुसांईजी के तीसरे लालजी ने देखी| उन्होंने उस डोकरी से कहा-" ये लालजी तुम हमें दे दो|" उस डोकरी ने लालजी उनके यहाँ पधरा दिये| डोकरी श्रीठाकुरजी के बिना बहुत दुखी हुई| श्रीठाकुरजी उस डोकरी के आर्त्तभाव को नहीं सह सके| श्रीठाकुरजी ने बालकृष्णजी से कहा-" मुझे तुम डोकरी के यहाँ पहुँचाओ| धानी-पूनी के बिना मेरा मन तुम्हारे यहाँ नहीं लगता है|" श्रीबालकृष्णजी ने रात में ही आकर डोकरी के घर श्रीठाकुरजी को पधरा दिया| डोकरी से कहा-" जैसे तुम नित्य करती थी, वैसे ही करो|" श्रीठाकुरजी तेरे पर प्रसन्न हैं| वह डोकरी ऐसी कृपा पात्र थी जिसके बिना श्रीठाकुरजी नहीं रह सके|

।जय श्री कृष्ण।



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