Monday, January 12, 2015

(वैष्णव - १) श्री गुसाईंजी के सेवक कृष्णदास की वार्ता

२५२ वैष्णवों की वार्ता 
(वैष्णव - १) श्री गुसाईंजी के सेवक कृष्णदास की वार्ता

कृष्णदास एक म्लेच्छ शासक के क्षेत्र में अधिकारी थे जो भी वैष्णव आता था , उसको व्यापार के लिए रुपया उधार देते और उससे खत लिखता लेते| इस प्रकार उनसे वे व्यापर करते थे । इस प्रकार के वयवहार से तीस हजार रुपया शेष रह गए । अत: म्लेच्छ ने कृष्णदास को बन्दीखाने में रख दिया । कृष्णदास के पुरोहित ने उन वैष्णवो के खातों को म्लेच्छ को देकर स्थिति को सप्षट करना चाहा तो कृष्णदास ने विचार किया - " इससे तो इन सभी वैष्णवो को कष्ट हो सकता है । अच्छा है ; मै अकेला ही कष्ट भोग लूँ ।'' अत : कृष्णदास ने उन खतो को जलवा दिया । म्लेच्छ शासक के यहाँ कृष्णदास की पेशी हुई । उसने पूछा - '' तुम्हारे पास किसी को रूपये देने की बाक़ियत हो तो बताओ ।'' कृष्णदास ने कहा - " हमारे पास कुछ भी बाक़ियत नहीं है ।'' म्लेच्छ को सम्पूर्ण स्थिति की जानकारी हो चुकी थी इसलिए म्लेच्छ ने कृष्णदास को " सिरोपा " देकर परगने में भेज दिया ताकि वहाँ से रुपया प्राप्त कर क्षतिपूर्ति की जा सके । कृष्णदास ने धीरे धीरे सब रूपये चूका दिए । वे कृष्णदास ऐसे कृपापात्र भक्त थे , जिन्होंने स्व्यं को बंदीखाने में डाला जाने पर भी वैष्णवों को कष्ट नहीं होने दिया । इस सतोगुण के प्रभाव से म्लेच्छ की बुद्धि को प्रभु ने परिवर्तित कर दिया ।
| जय श्री कृष्णा |
  • Blogger Comments
  • Facebook Comments

2 comments:

Item Reviewed: (वैष्णव - १) श्री गुसाईंजी के सेवक कृष्णदास की वार्ता Rating: 5 Reviewed By: Nathdwara Board
Scroll to Top