Wednesday, July 12, 2017

Shri Gusaiji Ke Sevak Ek Vaishnav Ki varata


२५२ वैष्णवो की वार्ता  
(वैष्णव - १५३ श्रीगुसांईजी की सेवक एक वैष्णव की वार्ता

उस वैष्णव के शरीर में कुष्ठ हो गया था अत: वह ब्रज में जाकर रहा| वह श्रीगुसांईजी और श्रीनाथजी के दर्शन नित्य प्रति करता था| वह श्रीगुसांईजी से प्रार्थना करता था की उसका कुष्ठ शीघ्र ही ठीक हो जाए| श्रीगुसांईजी आज्ञा करते थे - "श्रीठाकुरजी करते हैं सो सब सोच विचार करके ही करके ही करते है|" उस वैष्णव से श्रीनाथजी बोलने लग गए तो उसने श्रीनाथजी से प्रार्थना की - "मेरा कुष्ठ ठीक हो, ऐसी कृपा करो|" श्रीनाथजी ने कहा - "हम वैद्य नही है| यह कार्य तो वैद्य वर्ग का है|" ऐसा कहकर श्रीनाथजी उसके भक्तिभाव व धैर्य की परीक्षा करते थे| वह वैष्णव कहता - "प्राण चले जाएं तो कोई सोच नहीं है, लेकिन मैं अन्याश्रय नहीं कर सकता।" ऐसा कहकर वह बैठ रहता था| एकदिन श्रीनाथजी ने उस वैष्णव से कहा - "तुम अमुक गाँव में जाकर अमुक वैष्णव के घर जाकर दर्शन करके आओ| वह वैष्णव कहेगा तो तुम्हारा कुष्ठ भी ठीक हो जाएगा| तब तो वह वैष्णव निर्दिष्ट वैष्णव के गाँव में गया और उसके घर में जाकर दर्शन किए तो वहां उस वैष्णव के घर में वैश्या को देखा| लेकिन वैश्या को देखकर भी उसके मन में कोई दुर्विचार नहीं आया| वैष्णव ने पूछा - "तुम किस काम से आए हो ?" उस वैष्णव ने बता दिया की श्रीनाथजी की आज्ञा से वह दर्शन करने आया है| यह सुनकर उस वैष्णव को पश्चाताप हुआ की श्रीनाथजी तो मुझ पतित को भी नहीं भूले हैं| मैंने ऐसा दुष्कर्म क्यों किया| इस प्रकार उसे श्रीनाथजी के विरह का ताप हुआ| उस विरह ताप में उसकी देह छूट गई| उस वैष्णव का कुष्ठ भी दूर हो गया| उसके नूतन अंग हो गए| ये दोनों कार्य श्रीनाथजी ने एक साथ ही किये| एक वैष्णव को तो अपनी लीला में लिया और दूसरे का कुष्ठ मिटाकर उसे सेवा के योग्य बना दिया| वह कुष्ठी वैष्णव श्रीगुसांईजी का ऐसा कृपापात्र था|

                                                                    | जय श्री कृष्ण|
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