Wednesday, October 14, 2015

Shri Gusaiji Ke Sevak Ek Brajvasi Ki Varta

२५२ वैष्णवों की वार्ता
(वैष्णव ६९)श्रीगुसांईजी के सेवक एक ब्रजवासी की वार्ता

एक समय श्रीगुसांईजी द्वारिका पधारे । जामनगर में एक देवी का उपासक बनिया जोड़ा(जूती) बेचता था| उसकी दुकान पर ब्रजवासी वैष्णव जोड़ा खरीदने गए| ब्रजवासी ने जोड़ा(जूती) तो खरीद लिया| जब पैसे देने लगे तो बनिया अन्य काम में लग गया| उस ब्रजवासी की बात पर ध्यान नहीं दिया तो ब्रजवासी ने उसके एक लात मारी और पैसे दिये| बनिया ने मन ही मन में कहा-" तू मर जाए|" लेकिन वह नहीं मरा| बनिया ने अपनी देवी से पूछा-" मैने उस ब्रजवासी को मरने का शाप दिया, वह मरा क्यों नहीं| मै अन्य किसी को कहता हू वही होता है|" देवी ने कहा-" वह तो वैष्णव है|" वैष्णव से तो में भी डरती हू, इसलिए वह नहीं मरा| वैष्णव से तो ब्रह्मा-रूद्र-शेष-लक्ष्मी आदि सभी डरते है|" उस बनिया ने सोचा-" मै भी वैष्णव होऊंगा|" वह उस ब्रजवासी से मिला| ब्रजवासी से मिलकर श्रीगुसांईजी की शरण में गया| श्रीगुसांईजी ने उसे नाम निवेदन कराया मार्ग की रीति की शिक्षा दी और श्रीठाकुरजी पधराकर सेवा करने लगा| वह ब्रजवासी श्रीगुसांईजी का ऐसा कृपापात्र था जिसका देवी भी प्रतिबंध नहीं कर सकी|

।जय श्री कृष्ण।


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